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अब यह जानना आवश्यक है की धर्म और मजहब में फर्क क्या और कहाँ कहाँ है

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अब यह जानना आवश्यक है की धर्म और मजहब में फर्क क्या और कहाँ कहाँ है, मै पहले ही विस्तार से धर्म को दर्शा चूका हूँ |फिर भी धर्म वह शब्द है जिसका वर्णन पूरी जिन्दगी कोई पूरा नहीं कर सकता,वह इतना व्यापक विषय है | अब मै धर्म और मजहब में अंतर बताऊगा |धर्म और मजहब समानार्थक नहीं है और न धर्म ईमान या बिश्वास का विषयहै| कारण धर्म वस्तु है कृयात्मक, और मजहब विश्वासात्मक | धर्म मनुष्य के स्वभावानुकूल. अथवा मानव प्रकृति होने के कारण स्वाभाविक है. इसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम ही है | परन्तु मजहब मनुष्य कृत होने से.अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक है | कारण मजहबों का अनेक होना भिन्न भिन्न होना परस्पर विरोधी होना,अनेक मनुष्य कृत होना,अथवा बनावटी होने का प्रमाण.है कारण स्वाभाविक धर्म मनुष्य मात्र का एक ही है | जैसा, माता को माता ही कहना जानना और मानना, पिताको पिता कहना जानना,और मानना,यह स्वाभाविक धर्म जो मानव मात्र के लिए है| किन्तु मजहब अनेक है, और प्रत्येक मजहब उसके अनुयायियों के अतिरिक्त दूसरों के लिए अमान्य और अग्राह्यः है,इसलिए वह सार्वजानिक नहीं है |
धर्म सदाचार का नाम है धर्मात्मा होने के लिए सदाचारी का होना अनिवार्य है | परन्तु मजहबी या पन्थाई होने के लिए सदाचारी होना आवश्यक नहीं है | अर्थात जिस तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध है, उस तरह मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं है | क्योंकी की किसी मजहब का अनुयायी न होने पर भी मनुष्य सदाचारी [धर्मात्मा]बन सकता है| परन्तु आचार सम्पन्न होने पर भी कोई मनुष्य उस वक़्त तक मजहबी अथवा पन्थाई.नहीं बन सकता जब तक की मजहब के मन्ताब्वों पर ईमान अथवा बिश्वास नहीं लता, जैसे की चाहे कोई कितना ही सच्चा ईश्वरोपासक और उच्च कोटि का ही सदाचारी, क्यों न हो वह जब तक,हज़रत, मुहम्मद पर, हज़रात ईसा पर कुरान,और बाईबिल पर ईमान नहीं लाता तब तक कोई ईसाई ,या फिर मुस्लमान नहीं बन सकते, यह है मज़हब| इसपर ईमान लेन पर ही कोई ईसाई,व मुसलमान बन गया मजहबी बनगया |
धर्म के लिए यह ज़रूरी नहीं की आप किसी व्यक्ति विशेष को मानें,अथवा उनकी बनाई,या बताई गयी पुस्तक या उनके बनाये नियमों को माना जाये धर्म में इस के लिए कोई जगहनहीं| और यह धर्म मानव मात्र के लिए है, किसी व्यक्ति के लिए नहीं, किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं और यहाँ न तो बाईबिल, और ईसा, की बात है | और नहीं कुरान और मुहम्मद की बात है, और न राम की बात है, और न ही कृष्ण की, कारण धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है | अर्थात धार्मिक गुणों को या कर्मों को धारण करने से ही, मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है | या फिर यह कहें धर्म और मानवता एक दुसरे के पूरक है,धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व है | धर्म प्राण है, मजहब, शारीर, प्राण के बिना शारीर को मुर्दा, शव,अर्थी, अदि नामों से पुकारते हैं| फिर विचार करें,मजहबी,या पन्थाई. बन्ने के लिए उनके जो अरकान हैं,जैसा इस्लाम का, कलमा, नमाज, रोज़ा, ज़कात, हज, यह उनकी बुनियाद है भिंत या पिलर है | पर धर्म के लिए यह जरुरी नहीं है, जो ऊपर बताया गया वह किसी वर्ग के लिए नहीं मानव मात्र के लिए है,किन्तु हर कोई मानव न कलमा पढता न नमाज न रोज़ा न ज़कात न हज ? हाय है मज़हब यही भेद है मजहब और धर्म में | इस मजहबी भेद को जाने बिना धर्म का जानना या मानना,अथवा मानव कहलाना संभव ही नहीं,धर्म और मजहब के भेद को जानना जरुरी है जो इस्लाम जनता ही नहीं और नहीं जानना चाहता है,कारण यही तो मजहबी जूनून है |
जहाँ धर्म उच्च कोट का मनुष्य अथवा देवता बनने और जीवन मुक्त तथा विदेह मुक्त होने के लिए ज्ञान पूर्वक सदाचार को ही सर्वोपरि साधन बताता है | वहीँ मजहब नजात के लिए ज्ञान और सदाचार को अनावश्यक और निरर्थक ठहराता है | और,मात्र मजहबी उपदेश को ही अपना जीवन शैली बताता है | जैसा ईमान,जो की आप ने बिश्वास किया,अमन्तो बिल्लाहे वा मालाइ कतेही वा कुतुबिही व रुसुलिही,वल याव मिल अखेरे वलक़द्रे,खैरेही व शररेही मिनाल्लाहे तयला वल बय्से बादल मौते |أمنت با الله ومليكه و كتبه و ر سله و أ ليو م أ لا خر و أ لقد خير ه و شر ه من أ لله تعا لى ؤ أ لبعث بعد ا لمو ت हिंदी में पहले लिखा हूँ इसका अर्थ —ईमान लाया मै अल्लाह पर और उसके फरिश्तों पर,और उसके किताबों पर और उसके रसूलों पर और क़यामत के दिन पर और उसपर की.अच्छी और बुरी तकदीर खुदाये तायला की तरफ से होती है,और मौत के बाद उठाये जानेपर| यह है मजहबी ईमान,अब देखें की यह मनुष्य मात्र के लिए है या फिर किसी वर्ग विशेष केलिए? अब धर्म में परमात्मा का मानना तो जरुरी है ? किन्तु हज़रत मुहम्मद को रसूल कोई ज़रूरीनहीं और न ही कुरान को परमात्मा की किताब मानना ज़रूरी है |कारण धार्मिक किताब,और.मजहबी, किताब में भी अन्तर है | धर्म की किताब मानव मात्र का उपदेश है, मजहबी किताब में सिर्फ मजहब के मानने वालों के लिए उपदेश है | मात्र इतनाही नहीं कुरान के अतिरिक्त,उनसे पहले की किताबों को मानना पड़ेगा,आश्चर्यजनक बात है की जिस किताब को बातिल कर दिया गया छांट दिया गया,रिजेक्ट, कर दिया गया उसे भी मानना होगा |यह सब मजहबी मान्यता है अगर आप इसको संदेह करते है, या नहीं मानते हैं तो मजहब में आप के लिए कोई जगह नहीं|
अब देखें की उनके रसूलों पर बिश्वास करना होगा, वह रसूल कितने है ? चार [4 ] उनके नाम पहले बताया गया है | रसूल उनको कहाजाता है जिन पर अल्लाह ने किताबें नाज़िल की हों, यद्यपि नबी,या पैगम्बर एक लाख या दो लाख चौबीस हज़ार बताये जाते है | जो इन लोगों को भी सठीक पता नहीं, इन सब पर बिश्वास करना या ईमान लाना होगा | धर्म में इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, कारण धर्म की किताब मानव मात्र का एक ही है वह अदि प्रारम्भिक काल से है उसे बदलने से परमात्मा पर दोष लगेगा, जो पहले ही दर्शया गया ही | यहाँ मै यह बताना चाहूँगा की पैगम्बर, का अर्थ है पैगाम लाने वाला,वह पैगाम किसका,अल्लाह का | तो खुलासा यह हुवा की कुरान का अल्लाह सर्वब्यापक नहीं है ? अगर वह हर जगह होता तो फिर पैगम्बर के हाथ अपना पैगाम नहीं भेजता | इसी को हिन्दू लोग अवतार कहते और मानते हैं | किन्तु धर्म में अवतार के लिए कोई जगह नहीं,परमात्मा का कोई अवतार नहीं होता, यही कारन है की डॉ जाकिर नाईक, और उसके चेले यह सब कह रहे हैं की हज़रत मुहम्मद कलि युगके अवतार हैं, जो कल्कि अवतार बतारहे हैं,वेद और पुरानों का हवाला दे रहे हैं |
जो की यह सब मजहबी जूनून इसी को कहते हैं, कारण धर्म में इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं वेड में परमात्मा अवतार नहीं लेते,और नहीं वेड में किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा और न किसी की नाम की कोई गुन्जायेश | मजहब किसी व्यक्ति के निर्मित हैं, जैसा इस्लामी मजहब से मुहम्मद को हटाया जाये तो मजहब का अस्तित्व समाप्त | तो मजहब किसी इन्सान निर्मित है,और धर्म परमात्मा निर्मित | यही कारण है की धर्म सबके लिए है,मजहब सबके लिए नहीं, यानि जो मुहम्मद को अल्लाह्का आखरी रसूल नहीं मानता या मुहम्मद को नहीं मानता वह मुस्लमान नहीं बन सकता | कुरान गवाह है ,,देखें يٰٓاَيُّھَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اَطِيْعُوا اللّٰهَ وَاَطِيْعُوا الرَّسُوْلَ وَاُولِي الْاَمْرِ مِنْكُمْ ۚ فَاِنْ تَنَازَعْتُمْ فِيْ شَيْءٍ فَرُدُّوْهُ اِلَى اللّٰهِ وَالرَّسُوْلِ اِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ ۭ ذٰلِكَ خَيْرٌ وَّاَحْسَنُ تَاْوِيْلًا 59؀ۧ اے وہ لوگوں جو ایمان لائے ہو، حکم مانو تم اللہ کا اور حکم مانو اس کے رسول صلی اللہ علیہ وسلم کا ف۱ اور ان لوگوں کا جو صاحب امر ہوں تم میں سے ف۲، پھر اگر تمہارا اگر کسی بات پر آپس میں اختلاف ہوجائے تو تم اس کو لٹا دیا کرو اللہ اور اس کے رسول صلی اللہ علیہ وسلم کی طرف، اگر تم ایمان (ویقین) رکھتے ہو اللہ پر، اور قیامت کے دن پر، یہ بہتر ہے (تمہارے لئے فی الحال) اور (حقیقت اور) انجام کے اعتبار سے بھی،
अब देखें की यही मजहब है कुरान का कहना है की अगर आप मुहम्मद को नहीं मानते तो कोई भी मुस्लमान नहीं बनसकता | यह मजहब है, और धर्म में इसके लिए कोई ज़रूरी नहीं की आप किसी इन्सान का बताया,या चलाया हुवा मान्यता को आप मानें | धर्म में परमात्मा के साथ किसी भी बिचोलिया की ज़रूरत ही नहीं, सीधा आप परमात्मा को जानें और उसी का ही आदेश का पालन करें |

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