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अल्लाह किस प्रकार घुस देते हैं देखें |

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अल्लाह किस प्रकार घुस देते हैं देखें ||
एक बार की नमाज हज में पढ़ी जाये तो 50,000 नमाज का सवाब मिलेगा यह घुस नहीं तो और क्या है, दुनिया में लोग इसे सूद भी कहते हैं की जितना दे उसे से कई गुना ज्कादा मिलने का नाम सूद भी हैं | जिस सूद को अल्लाह ने खुद हराम करार दिया है | लेख को पूरा पढ़ें |
 
मसलन उम्र भर में एक बार हज करना फर्ज है। अगर कई बार हज करे तो फर्ज एक ही होगा बाकी सब नफल है और उनका भी बहुत बड़ा सवाब है। जवानी से पहले लड़कपन में कोई हज किया, तो उसका कुछ ऐतबार नहींऔर जो लड़कपन में किया है वह नफल होगया, यहाँ और बहुत कुछ है सब छोड़ा।
 
अब देखें ज्यारते मदीना- अगर गुन्जायेश हो तो हज के बाद या हज से पहले मदीना मुनव्वरा हाजिर होकर रसूले मकबूल स० के रोजा और मस्जिदे नववी का ज्यारत कर बरकत हासिल करे। इसकि निस्बत हुजुर स० ने फरमाया हैं कि जिस शख्स ने मेरे वफात के बाद मेरी ज्यारत की, उसको वही बरकत मिलेगी, जिसने मेरी जिन्दगी में ज्यारत की,और यह भी फरमाया कि जो सिर्फ हज करले और मेरी ज्यारत को न आवे, उसने मेरे साथ बेमरावती की।
 
और उस मस्जिद के हक में आपने फरमाया के जो शख्स इसमें एक नमाज पढ़े, उसको 50,000 नमाज के बराबर सवाब मिलेगा। अल्लाह तायला हम सब को यह दौलत नसीब करे।और इस नेक कामों की तौफिक अता फारमाये आमीन या रब्बुल अलमीन। अब यह क्या अंधविश्वास नहीं है कि 1 का 50,000 मिले! यह रिश्वत नहीं है क्या?
 
अब पढ़े लिखे लोग ही बताएं कि भले ही यह मूर्ति पुजा नहीं है। पर व्यक्ति पूजा नहीं है यह कैसे कह सकते हैं आप? मात्र रूढ़िवादी विचार ही तो है, के मेरे जीते जी, और मेरे मरने के बाद जो ज्यारत करे उसको वही बरकत मिले।
 
एक जीता आदमी से मांगे तो मिलना संभव है। पर जो दुनिया में नहीं है उससे मांगना ही तो अन्धविश्वास है, उस इन्सान की पूजा ही तो है। अब वहां मिन्नत मानने कि भी बात है, लम्बा प्रकरण है मिन्नत मानने कि भी। असलम कासमी साहब ने तथा कथित महबूब अली को जवाब लिखने में अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि कुरान के शाने नुजूल को देखे बिना ही महेन्द्रपाल ने लिख दिया। जबकि शाने नुजूल को देखने पर कुरान का सही अर्थ मालूम हो सकेगा।
इस हज प्रकरण में, मैं एक आयात का शाने नजूल देरहा हूँ ध्यान से पढ़ना। यह सहीह बुखारी किताबुलमनासिक सफा और मरवा में भी लिखा है और जो मैं सूरा अल बकर 158 का हवाला ऊपर पहले दे चुका हूँ | यह जो आयत लिखा हूँ,सफा मरवा पहाड़ों में दौड़ने कि बाबत यह आयत अल्लाह ने नाजिल की। इसका मतलब यह है कि सफा मरवा का तवाफ न करने वाले पर कोई गुनाह नहीं। तो फरमाया तुमने गलत बात कही, अगर यह मतलब होता तो आपका हिस्सा यूँ होना चाहिए था।
لاجناحعليهأنيطوفبهما
अब यह अंसार के मुताल्लिक नाजिल हुई। वह लोग कबल अज इस्लाम मिनात नामी बुत के पास एहराम बांधते थे, जिसकी वह पूजा करते थेऔर वह मश्लाल के पास था जो शख्स एहराम बांधता था वह सफा मरवा के तवाफ को बुरा समझता था। जब वह लोग मुस्लमान होगये, तो उन्होंने हुजुर स० से इसके मुताल्लिक इस्तेग्फार किया। कहा कि हम तो इसका तवाफ करना बुरा समझते थे, तब अल्लाह तायला ने यह आयत नाजिल फरमाई। आगे लिखा कि जो लोग मिना तवाफ का एहराम बाधत थे वह सफा और मरवाह का तवाफ करते थे। जब अल्लाह ने तवाफ काबा का जिक्र किया. और कुरान में सफा मरवा का जिक्र नहीं आया जब लोगों ने यह बात उठाई तो अल्लाह ने यही आयात नाजिल फरमाई ।
 
यह है कुरान कि शाने नुजूल, यह दो ग्रोह के मुताल्लिक नाजिल हुई। जिनमें एक तवाफ करता था और दूसरा गुनाह समझते थे इस तवाफ को। तो अल्लाह ने तवाफ काबा का जिक्र तो किया, पर सफा मरवा का जिक्र नहीं किया था यहाँ तवाफ काबा के बाद सफा मरवा का जिक्र है। तो यहाँ अगर दो गुटों में मतभेद न होता तो अल्लाह को यह आयात उतारना ही नहीं पड़ता, यानि अल्लाह का ज्ञान अधूरा इसलिए है कि वह जरूरत होने पर उतारा करते हैं या जरूरत होने पर उतरती है। यह ज्ञान अल्लाह को पहले से नहीं कि इसकी जरूरत है या नहीं। जो पहले से नहीं जानते उसका अल्लाह होना संभव है, किन्तु वह परमात्मा नहीं हो सकता। कारण परमात्मा का ज्ञान परिपूर्ण है आदि से है और अंत तक ही रहना है। इसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन होना संभव नहीं।
 
अल्लाह को ज्ञान बदल-बदल कर देना पड़ा, जो अल्लाह की कमी को दर्शाता है। आप लोगों ने जरूर देख लिया होगा कि हज में वही सारा काम करना पड़ता है जो हजरत मुहम्मद साहब ने किया और जो उन्होंने कहा उसी को अपने ऊपर घटित करना, जिसमें बहुत सी ज्ञान विरुद्ध बातें हैं। जो उस काल में वहां नहीं थी, किन्तु आज सुविधा हो चुकी है। उसके बाद भी पहले वाली को ही मानना। जो अकल पर ताला डालने जैसे बातें हैं।
महेन्द्र पाल आर्य 14/8/22

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