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आज के दिन को कोई भी हिन्दू आर्य कहलाने वाले नव वर्ष न मनाएं |

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आज के दिन को कोई भी हिन्दू
आर्य कहलाने वाले नव वर्ष न मनाएं |
आज रात 8 बजे इस पर लाइव स्ट्रीम करेंगे हमारा नव वर्ष कब और कौन सा दिन है |

हमारा औ३म यही है ॐ वाला क्यं नहीं कल बताया था आज उसके आगे ||
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः। वेद त्रायन्निरदुहद् भुविः स्वरितीति च| (मनु 2/76) अर्थ:- प्रजापति ने, अकार, उकार, तथा मकार(इन ओम की तीन मात्राओं) तथा भूर्भुवः स्वः- (इन तीनों व्याहृतियों) को वेदत्रयी से दुह कर निकला है ।
(13) तानि(भूर्भुवः स्वः) शुक्रण्य भ्यतपते भ्योडभितप्ते भ्यो स्त्रयों वर्णों। अजायन्त अकार, उकार, मकार, इति तानेकधा सम भरतदेतदो मित्ति | (ब्राह्मण -5-32) अर्थ:- इन तीन (भूः भुवः स्वः रूप) शुक्रों को तप्त किया उनसे तीन वर्ण पैदा हुए, वे हें यह अकार उकार व मकार। उनको क्रमशः मिलाया। उससे यह पद ओ३म् है। अब तक के दिये हुए प्रमाणों से पाठकगण जरूर पता लगा लिए होगे कि परमात्मा के असंख्य होने पर भी कहीं नाम अल्लाह, खुदा या गॉड़, लौड, या फिर राम व कृष्ण, आदि नाम कहीं पर भी नहीं आया, और न आना सम्भव है। साथ साथ परमात्मा के और अल्लाह के नामों में अन्तर या भेद को भी देख लिया होगा? मेरा उददेश्य भी जनता जनार्दनों को यह सच्चाई बताना था, जिसे आज दुनिया जानती ही नहीं, जो इस्लाम वालों ने भली भांति इस सत्य को जानते हैं। जो गैर इस्लामि लोग जानना ही नहीं चाहते।
ईश्वर प्राणी मात्र का है, प्राणी मात्र का कल्याण भी करता परन्तु अल्लाह के नाम तथा गुण को भी देख लिया होगा, जो मात्र मुसलमानों का है, तथा मुसलमानों का ही भला चाहता है। ओ३म् के तीन अक्षरों में समाविष्ट नामों के लिए और भी प्रमाण देखें।
1. जागरितस्थानों वैश्वानर काठः प्रथम मात्रा- जागरित स्थान= विराट । वैश्वानर = अग्नि अकार प्रथम।
2. स्वप्नस्थान तैजस उकारो द्वितीया मात्रा स्वप्नस्थान-हिरधयगर्भ । तैजस= तैजस उकार दूसरी मात्रा।
3. सुषुप्त स्थान प्राज्ञमकारस्तृतिया मात्रा- सुषुप्त स्थान= ईश्वर। प्राज्ञ= मकार तीसरी मात्रा ।
नोट- यहाँ पर थोड़े भेद के साथ महर्षि की ही बात उपनिषद में हैं, वैश्वानर तैजस और प्राज्ञ ये तीन अर्थ क्रम से, ओ३म के वैसे ही लिखे हैं, जैसे कि महर्षि ने लिखा है | परमात्मा के नामों के प्रमाण – (14) विराट्- (क) प्रजापतिः परमेष्ठि विराट् (अथर्व 4-11-7) वही विश्व का प्रभु स्वयं (प्रजापति) समस्त स्थावर जंगम प्रजा का पालक (परमेष्ठि) परममोक्ष धाम सत्यलोक आनन्दमय रूप में विराजमान(विराट्) सब से अधिक एवं विविध प्रकार से प्रकाश मान एवं स्थूल प्रपंच का कर्त्ता है । अग्नि-एकसद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मात रिश्वानमाहुः(ऋ-1-164-46) एक सत्य स्वरूप परमात्मा को मेधावी लोग बहुत प्रकार से कहते हैं । उसको ही अग्नि, यम और मातरिश्वा कहते हैं।
आज रत 8 बजे जरुर जुड़ना आप लोग धन्यवाद
महेन्द्र पाल आर्य 1 जनवरी 2023

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