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आर्य समाज में बढ़ रहा है निरंतर पण्डा गिरी

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यह विचार ऋषिदयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में दिया है ||
अब सवाल पैदा होता है की आज यत्र तत्र आर्य समाज में करते कराते यज्ञ में क्या इस पर अमल हो रहा है ?
आए दिन आर्य समाज में इस के विपरीत कार्य करने वाले आर्य समाज के विद्वानों और अघिकारियों द्वारा हो रहा है इन्हें न कोई रोकने वाला और न कोई इस पर कुछ बोलने वाले | जब ऋषि मान्यता के खिलाफ आप काम करेंगे तो आप को लाभ कहाँ से और कैसे मिलेंगे ?
कुछ विद्वान् किसी किसी आर्य विद्वानों का हवाला देते हैं की अमुक विद्वान् ने पारायण यज्ञ किया था | मेरा सवाल यह होगा की हमारे आदर्श कौन है ऋषि दयानंद अथवा कोई और विद्वान ? सवाल यहाँ यह खड़ा है,और इसमें होता क्या है उसे भी देखें |
यज्ञ शाला में चार आसन चारो दिशाओं में होता है और इस पर बैठने वालों के नाम अलग अलग है | जैसा एक, होता, दूसरा उद्गाता, तीसरा अध्वर्यु, चौथा ब्रह्मा |
जैसे इन सबके नाम अलग हैं ठीक इसी प्रकार इन सबके काम भी अलग अलग, जिनका नाम ब्रह्मा है उनका काम है निरक्षण करना उन्हें मन्त्र बोलना नहीं है | जो उद्गाता है वह मन्त्र बोलेंगे | अब यह लोग चारों तरफ सब को यजमान बनाते हैं | कारण चार यजमान होंगे तो दक्षिणा चारों तरफ से मिलेंगे |
 
सिर्फ अपना पण्डा गिरी ही चलाना है, सिधांत से कोई मतलब ही नहीं है और न यह लोग सिधांत की जानकारी देते हैं | कारण अगर यह ऋषि दयानन्द जी के बताये और लिखे गए तरीके को अपनाते हैं तो इनकी पण्डा गिरी समाप्त, इन्हें तो मात्र दक्षिणा ही चाहिए चारों तरफ से बटोरना ही इनका मकसद हैं |
 
यह खयाल नहीं रखते की ऋषि दयानन्द जी ने हमें तरीका क्या बताएं हैं और क्या लिखा है अपनी पुस्तक में ? दूसरी बात यह है की किसी भी कार्यक्रम में तीन चार या फिर उससे भी ज्यादा विद्वान् बुलाते हैं अब सभी को यज्ञ कराना आता है लेकिन एक ही यज्ञ कराने के लिए सांप जैसा कुडली मार कर बैठ जाते हैं और दक्षिणा बटोरते हैं जो तरीका सरासर गलत है |
 
आज समस्त आर्य समाज में यही देखने को मिल रहा हैं जो ऋषि मान्यता के खिलाफ है ऋषि ने अपनी संस्कार विधि में 16 संस्कार लिखे हैं, और पंच महायज्ञ में केवल पांच ही महा यज्ञ बताये है, और उन सब में आहुति देने के लिए मन्त्रों का चयन किया है | जिस मन्त्र को ऋषि ने नहीं लिखा उसी को यह सभी बोलते हैं |
 
जैसा स्तुतामया, और मृतुन्जय मन्त्र ऋषि ने नहीं लिखा और न बोलने को कहा फिर भी यह बोले जाते हैं जब इनसे पूछते हैं तो ज़वाब मिलता है की स्वामी जगदीश्वरानन्द जी ने लिखा है |
 
यह अकल के दुश्मन ऋषि दयानंद को न मानकर किसी और को मानने लगे हैं |जो अवैदिक है हमारा आदर्श ऋषि दयानन्द जी ही है न कोई और ?
 
आज सब जगह आर्य समाज में ऋषि दयानन्द का गला घोटने वाला काम कर भी यह लोग अपने को दयानन्द का मानने वाला बताते हैं जो सरासर झूठ है ऋषि का अपमान करना ही है | लिखने को बहुत हैं थोडा बहुत आप लोगों को बताया हूँ आगामी कल 19 अप्रैल 22 को इसपर विडिओ बनाकर दूंगा |

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