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आर्य समाज में बढ़ रहा है निरंतर पांडा गिरी |

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आर्य समाज में बढ़ रहा है निरंतर पांडा गिरी |
आर्यों के कर्मकांड में एकरूपता ना होने के लिए दोषी कौन ?
विश्वभर में अनेक मत मतांतरतथा संप्रदाय का जन्म हुआ जिन्हें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध व जैनियों के नाम से जाना जाता है । इन मतवादियों में अनेक गुट भी हैं, किंतु संस्थापक इनके एक ही है । इन मतवादियों में सिद्धांतिक मतभेद है और आपस में एक दूसरे के साथ भी मेल नहीं खाते । किंतु इन सभी मतवादियों का कर्मकांड एक ही है, कर्मकांड में एक दूसरे से मतभेद नहीं है ।
उदाहरणार्थ ईसाइयत का प्रचार हुआ जरूजालिम के वैतूल मुकद्दस से, जो इन ईसाईयों में कैथलिक और प्रोटेस्टेंट है । इनमें विवाद हजरत ईसा मसीह के मरने व न मरने को लेकर है तथा प्रलय से पहले ईसा मसीह का पृथ्वी पर आने तथा न आने को लेकर है, पर उपासना पद्धति में कोई मतभेद नहीं ।
अर्थात वैतूल मुकद्दस में ईसाई जिस प्रकार से प्रार्थना करते हैं भारत में रहने वाले ईसाई भी उसी पद्धति से प्रार्थना करते है,नेपाल जैसे हिंदू राष्ट्र में रहने वाले ईसाई भी उसी तरीके से प्रार्थना करते है ।
इसी प्रकार अरब से इस्लाम का प्रचार हुआ,अरब का रहने वाला जिस प्रकार से नमाज पढ़ता है, भारत का रहने वाला मुसलमान हो या नेपाल जैसे हिंदू राष्ट्र में रहने वाला मुसलमान सबके नमाज पढ़ने का तरीका एक ही है | यद्यपि इस्लाम में अनेक गुट है जो एक दूसरे से काफी कुछ मतभेद रखते हैं |
 
जैसे शिया और सुन्नी में मतभेद है, हनफी कादियानी में मतभेद है,सुन्नी में ही कई-कई फिरके है, देवबंदी और बरेलवी में मतभेद है, यहां तक कि इस्लाम जगत में कर्मकांड को दर्शाने वाले 4 ईमाम हुए हैं उन चारों में भी मतभेद है | ईमाम अबू हनीफा,ईमाम शायफी,ईमाम हंबल तथा ईमाम मलिक के नाम से प्रख्यात है | इनमें ईमाम अबू हनीफा के मानने वालों की संख्या अधिक है और इसी में ही 72 फिरके माने जाते हैं या कयामत तक 72 फिरके हो जाएंगे आदि |
हिंदुओं में भी यही बात है कहीं-कहीं पूजा व पूजनालय के नाम से मतभेद है, इतना सब कुछ होने के बाद भी पूजा करते समय, आरती उतारते समय, सभी एक ही पुस्तक को अमल में लाते हैं | इसमें किसी का कोई मतभेद नहीं और कोई यह नहीं कहता कि मैं अलग ढंग से देवी पर प्रसाद चढ़ाऊंगा या अलग और कुछ करता रहूं आदि |
नमाज में भी तरीका ठीक वैसा ही है, कि मैं अलग प्रकार से नमाज अदा करूंगा या अलग आयात का पाठ करूंगा, कुरान न पढ़ कर हदीसों को पढूंगा आदि | चाहे कितना मतभेद क्यों न हो और बातों पर किंतु कर्मकांड चाहे शादी में हो या जनाजे में सबका नियत एक ही है, तरीका भी एक ही है |
किंतु आर्य समाज इन जैसा मतपन्थ नहीं है, विशुद्ध सत्य सनातन वैदिक धर्म है | वेद पर आधारित है, ईश्वर प्रदत्त धर्म है, व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया गया नहीं है, आदी सृष्टि से है और प्रलय तक ही रहेगा, इसमें कोई परिवर्तन न आया न ही आना संभव है | मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जब आगमन धरती पर नहीं हुआ था उससे पहले यह धर्म था, आज भी है और आगे भी रहेगा | योगीराज कृष्ण जब धरती पर नहीं आये थे उससे पहले भी यह धर्म था, आज भी है और प्रलय तक रहेगा, इस धर्म का कर्मकांड भी शाश्वत रहा | ऋषि दयानंद ने भी माना है महाभारत काल के कुछ पहले ही इस धर्म का ह्रास हुआ था और युद्ध में अनेक विद्वान मारे गए और जो बचे उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया | यहां तक कि दयानंद के कार्य-काल में वेद को भी जर्मनी से मंगाना पड़ा |
पुनः नये ढंग से ऋषि दयानंद को वैदिक धर्म के प्रचार हेतु अनेक बार विषपान भी करना पड़ा | दयानंद ने साफ शब्दों में कहा,‘अलग कोई मत या पंथ चलाने का लेश मात्र भी अभिप्राय मुझ में नहीं है, सत्य का प्रतिपादन करना अपना उद्देश्य समझता हूं | ब्रह्मा से लेकर जैमिनी पर्यंत ऋषि मुनियों के जो विचार है उसी का उजागर करना अपना कर्तव्य मानता हूं’ |
अतः यह स्पष्ट हो गया, आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानंद ने अलग कोई मत न चलाकर ईश्वर प्रदत्व सनातन वैदिक धर्म का उजागर करते हुए आर्य शब्द को वेद तथा ईश्वर से जोड़कर वेद से ही प्रमाण दिया | आर्य नाम वेद का है,“अहम् भूमिम् आद्दाम आर्य:” वेद में आया है । यह भूमि मैंने आर्यों की दी | परंतु कुछ मूढ़ व ना समझ लोग इस वैदिक नाम को तथा ईश्वर के दिए गए नाम को छोड़ मुसलमानों द्वारा दिए गए ‘हिंदू’ नाम को स्वीकार करने में भी संकोच नहीं करते | और “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” कहकर अपने कर्तव्य का पालन छोड़ दिया, और जब से ईश्वर पुत्र आर्य के बजाय हिंदू बन गए तो अपना क्रियाकलाप, उपासना पद्धति और कर्मकांड भी वैदिक होने के बजाय पौराणिकता को अपनाया, जो कर्मकांड सत्य पर आधारित था उसमें मिलावट हो गया |
 
आर्य समाज के प्रवर्तक ऋषि दयानंद को सत्य का प्रतिपादन करने हेतु और वैदिक ऋषियों की मान्यता की स्थापना हेतु अनेक यातना व मान-अपमान और ईटें व पत्थर खाकर भी ईश्वर पुत्र आर्यों में एकरूपता लाने हेतु न मालूम किन-किन ग्रंथों का अवलोकन किया और सभी आर्यों को एक वेद रूपी धागे में पिरो कर सत्यार्थ प्रकाश से लेकर वेद भाष्य, तथा छोटी-छोटी पुस्तकों को लिखते हुए, आर्यों का कर्मकांड कैसा हो इस पर दो पुस्तकें,1 {पंचमहायज्ञ विधि व अंतिम पुस्तक संस्कार विधि को लिखा } यद्यपि लिखने वाले विद्वानों ने मनमानी किया, जिसके दूसरे संस्करण में सुधार किया गया आदि |
मूल रूप से आर्यों को बताया पांच महायज्ञ है, आर्य लोगों इसे जीवन में उतारना, वैसे यज्ञ तो प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य को ही कहा गया किंतु उन यज्ञों में पांच ही महायज्ञ है– {1 ब्रम्हयज्ञ} {2 देवयज्ञ} {3पितृयज्ञ} {4बलिवैश्यदेवयज्ञ} {5अतिथियज्ञ} जैसे इन यज्ञों के नाम अलग-अलग हैं, ठीक इसी प्रकार इसमें आहुति डालने के मन्त्रों को भी अलग ही दर्शाया है | देवयज्ञ को ऋषि ने सामान्य प्रकरण नाम से, सामान्य यज्ञ को नित्यप्रति प्रातः, सायं सोलह आहुति देने को लिखा है क्योंकि सामान्य प्रकरण नित्य दोनों समय करने का है | ईश्वरस्तुति प्रार्थना उपासना, स्वस्तिवाचन, शांतिकरण के पश्चात अग्न्याधान और नित्य में सामान्य प्रकरण के सभी मंत्रों से आहुति देने के बाद ही | व्याहृति 4 आज्याहुति मंत्र 12 फिर गायत्री और अंत में स्विष्टिकृत आहुति लिखा है, इसके अतिरिक्त आहुति के लिए मात्र दो मंत्र का चयन किया है, गायत्री व विश्वानि देव मंत्रों से आहुति देने की बात ऋषि दयानंद ने लिखी है |
मुझे आर्य समाज का प्रचार करते प्रायः 39 वर्ष हो गया है, आर्य समाज के कर्मकांड में एकरूपता नहीं देखी ना मालूम क्यों | कुछ विद्वानजन तर्क देते हैं कि यह अंतिम किताब है संस्कार विधि इसमें विद्वानों ने मिलावट किया है, अतः मैं जो कह रहा हूं यही ठीक है |
आर्य समाज में विद्वानजन ऋषि दयानंद को मानने के बजाय अपनी विद्वता का प्रदर्शन अधिक करते हैं | यहां तक मैंने देखा सत्यार्थ प्रकाश में लोगों ने अपने को संसोधक व सम्वर्धक लिखा | आचार्य प्रियदर्शन जी ने बंगला सत्यार्थ प्रकाश में यही शब्द लिखे हैं, स्वामी जगदीश्वरानंद जी की भी यह मान्यता कुछ इस प्रकार है कि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में कुछ अशुद्ध ही लिखा मैं शुद्ध कर रहा हूं |
मैं लिख रहा था यज्ञादि विषय, महात्मा प्रभु आश्रित जी की मान्यता अलग, आचार्य विश्वेश्रवा की मान्यता अलग, पं. श्री युधिष्ठिर मिमांसा जी की मान्यता अलग, स्वामी मुनीश्वरानंद जी की मान्यता अलग, स्वामी इंद्रदेव यति पीलीभीत वाले की मान्यता अलग और कई विद्वान अपनी अलग मान्यता रखते हैं |
सबसे बड़ी बात यह है कि विभिन्न प्रकाशन वालों ने भी अपनी मनमानी की है, जिनको जो भाया अपने विद्वता का प्रदर्शन किया, यहां तक की मर्यादा को भी ताक पर उठाकर रखा बुद्धि पर भी ताला डाल दिया | मैं सुनता हूं कि इस उलझे हुए मसले को सुलझाने हेतु धर्मार्य सभा नाम की संस्था काम करती है, यह सभा सार्वदेशिक सभा के अंतर्गत है | परंतु सार्वदेशिक सभा द्वारा प्रकाशित कर्मकांड की तीन पुस्तकें हैं और तीनों एक दूसरे से मेल नहीं खाती |
पिछले दिन आर्य जनों ने देखा, सुना और पढ़ा भी है, आर्य समाज 125 वां महासम्मेलन मुंबई में मनाया | यज्ञ के ब्रह्मा स्वामी सत्यम जी थे और उनके प्रत्येक आहुति को ओम् स्वाहा कहकर डलवाने हेतु विरोध हुआ |सबसे पहले आचार्या सूर्या पाणिनी कन्या विद्यालय वाराणसी, प्रोफेसर ज्वलंत कुमार जी, डॉ. सोमदेव आदि ने कमर बांधकर विरोध किया और ‘शास्त्रों का प्रमाण’,‘आर्य समाज व दयानंद भी ओम् स्वाहा के घेरे में’ आदि लेख पर लेख विभिन्न पत्रिकाओं में निकालते रहे | एक पुस्तक भी निकाली गई यह आरोप मात्र स्वामी सत्यम जी पर ही नहीं अपितु सार्वदेशिक सभा प्रधान माननीय कैप्टेन साहब पर भी लगाया गया | उनके परिधान की भी आलोचना सूर्या जी की लेखनी के माध्यम से हुआ आदि | धर्मार्य सभा की निष्क्रियता उजागर हो गई, कोई भी बयान नहीं आया और न ही सार्वदेशिक सभा ने कोई निर्णय आया‘ओम् स्वाहा’ के पक्ष में या विपक्ष में |
शास्त्रीय पक्ष को ध्यान में न रखकर आचार्य सत्यानंद वेद वागीश जी का लेख कई पत्रिकाओं में निकलता रहा और दोनों पक्षों की लेखनी निरंतर विभिन्न पत्रिकाओं में आरोप-प्रत्यारोप,प्राय: प्रश्नोत्तरी के रूप में निकलती रही |
परंतु कोई समाधान आर्य जनों को नहीं दिया गया, साधारण आर्य जनता आज भी दिग्भ्रमित है | मैंने ऋषि सिद्धांत रक्षिणी सभा के अध्यक्ष जी से अनुमति लेकर दोनों पक्ष के विद्वानों को लिखा, मैं इस सभा का मंत्री था | मैंने लिखा आप “दोनों पक्षों के विद्वान् समय दीजिये हमारी सभा आप दोनों पक्षों के विद्वानों का शास्त्रार्थ कराकर साधारण आर्य जनता के सामने दोनों के शास्त्रार्थ में दिए गए निर्णय को सामने लाकर दिग्भ्रमित होने से बचाते हुए आर्यों के कर्मकांड में एकरूपता लाना चाहती है” हमारी ऋषि सिद्धांत रक्षणी सभा |
 
आर्य जनों का दुर्भाग्य रहा अपने को कर्मकांडी विद्वान सिद्ध करने वाले दोनों पक्षों के विद्वानों ने मौन साध लिया, मात्र एक बहन का उत्तर आया ‘हमें माफ करें हमें अपने हाल में छोड़े’ | अब आर्य जनता स्वयं ही निर्णय ले सकती है कि आर्यों के कर्मकांड में मतभेद के दोषी कौन ?
इधर विभिन्न प्रकाशन वाले भी अपने को ऋषि दयानंद से अधिक ज्ञाता होने या दिखलाने की होड़ में प्रतियोगिता में जुटे है, दयानंद ने नित्य को पहले लिखा और विशेष को बाद में पर अकल के दुश्मनों ने विशेष को पहले करके नित्य को बाद में कर दिया | इन लोगों से कोई यह पूछे कि प्रातः उठकर शौच स्नानादि धौत क्रिया पहले करते हैं या भोजनादि ? यहां पर भी बात ठीक रही हो रही है |
ऋषि दयानंद ने स्विष्टकृत को प्रायश्चित आहुति लिखा है घृत अथवा भात से दें कहा, किंतु दयानंद की मान्यता को ताक पर रखते हुए प्रथम चार व्याहृति आहुति के बाद ही यदस्य कर्म वाला मंत्र लिखा व छाप रखा है और उसमें भी पंडा पुरोहित घृत व भात छोड़ लड्डू, बर्फी, हलवा, खीर को पूछते हैं डालने को |
इन लोगों से यह पूछा जाए कि प्रायश्चित पहले हो गया और गलती बाद में हो जाए तो ? यही कारण है ऋषि ने अंत में लिखा मीमांसक जी भी यही मानते हैं |
 
ऋषि दयानंद ने कर्मकांड की दोनों पुस्तकों में से किसी भी प्रकरण में त्र्यंबकम मंत्र को नहीं लिखा और न ही स्तुता मया को लिखा किंतु इस मन्त्र को बोले बिना इन करम कांडी विद्वानों को चैन नहीं मिलती न जाने इसे बोलकर जनता को क्या दर्शाना चाहते हैं | इस प्रकार कर्मकांड को मनमानी बनाकर आर्य जनता को गलतफहमी का शिकार बनाया जा रहा है, इसपर नियंत्रण कौन रखें, यह जिम्मेदारी किसकी है ?
ऋषि दयानंद ने संस्कार 16 लिखा है और महायज्ञ 5 लिखा | आज नित्यप्रति आर्य समाज द्वारा इससे हटकर न मालूम कितने संस्कार कराने लगे हैं और कितने महायज्ञ करवाये जा रहे हैं | ऋषि दयानंद ने उपनयन संस्कार का अलग प्रकरण लिखा है, किंतु आज सामान्य यज्ञ में केवल यज्ञोपवित मंत्र से उपनयन दिया जा रहा है | इसमें यज्ञोपवीत संस्कार को ही समाप्त कर दिया, क्योंकि जब यज्ञशाला में बैठे-बैठे उपनयन मिल जाता है तो उसका संस्कार कौन कराएं ? यही हाल बलिवैश्यदेवयज्ञ का है, सामान्य यज्ञ में ही बलिवैश्यदेव यज्ञ के मंत्रों से आहुति डलवाई जा रही है जबकि बलिवैश्यदेव यज्ञ एक महायज्ञ है, उसे भी समाप्त कर दिया इसके लिए दोषी कौन ?
महेन्द्र पाल आर्य 27/9/22

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