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इस्लाम की पढाई में मैंने यही जाना था |

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इस्लाम की पढाई में मैंने यही जाना था |
की जो अल्लाह को नहीं मानता, जो अल्लाह के फरिश्तों को नहीं मानता,जो अल्लाह के रसूलों को नहीं मानता, अल्लाह कि किताबों को नहीं मानता, अर्थात तौरैत–जबूर–इन्जील–व कुरान को नहीं मानता | यह सभी अल्लाह की किताब बताये गये हैं जो इन्हें नहीं मानता,और जो अल्लाह के रसूलों को नहीं मानता, जो कयामत के दिन को नहीं मानता | अच्छे बुरे का किस्मत अल्लाह का बनाया हुआ है जो इसे सत्य नहीं मानता, मरने के बाद वाली जिन्दगी में जन्नत और जहन्नुम को नहीं मनाता, वह सब काफ़िर हैं |और अल्लाह ऐसे काफिरों का दुश्मन है पहले बता दिया | इसे यहाँ बताया गया है |
 
ईमाने मुफ़स्सल, अमन्तु बिल्लाहे व मला इकातही व कुतुबिही व रुसुलिही,वल यावमिल आखिरी वल कद्रे खैरिही व शर्रेही मिनाल्लाहे तायला वल बायसे बयदल मौतिही |
और मुज़म्मल = अमन्तु बिल्लाहे कमा हुआ बे असमाईही व सिफातेही व काबिल तो जमिया अहकामिही | इकरा रुम बिल लिसान, व तस्दिकुम बिल कल्बे ||
यह दोनों ईमान के दायरे हैं इसे जुबान से बोलना और दिल से इकरार करने का नाम ईमान है | इसे जो मानता है वही ईमानदार कहलाता है और जो नहीं मानता वेह ईमानदार नहीं है | अर्थात बे ईमान
 
इसमें बताया गया है =ईमान मुफ़स्सल में > ईमान लाता हूँ मैं {ईमान} विश्वास अल्लाह पर, और उसके फरिश्तों पर, और उनके किताबों पर, और उनके रसूलों पर, और आखिरत के दिनों पर, और अल्लाह ने अच्छे बुरे का किस्मत बनाया उस पर, कयामत पर और जन्नत, जहन्नुम पर, और मरने के बाद जी उठने पर |
 
ईमाने मुज़म्मिल = ईमान लाता मैं, अल्लाह पर, जैसा वह अपने नामों और सिफ़तों {गुणों} पर, और कुबूल किया मैं उसके सारे हुकुमों को, जुबान से इकरार करता हूँ और दिल से तस्दीक करता हूँ |
 
तो आप लोगों ने देख लिया इस्लाम की बुनियाद, भींत, या पिलर को,इसी पर ही इस्लाम का सारा कुछ बताया गया है इससे बाहर, इसे ना मानने पर या इसमें संदेह करने पर न मानने पर वह इस्लाम में नहीं रह सकता |
 
उसे काफ़िर बे दीन बे ईमान मुशरिक आदि कहा गया है | अल्लाह के पास यह भेद हैं | किन्तु परमात्मा ने मानव मात्र में किसी से कोई भेद नहीं किया और न किसी को बेदीन और बे ईमान कहा | पर्मटके पास सिर्फ योग्य और युग्य शब्द हैं अर्थात जो परमात्मा का आदेश का पालन करता है वह योग्य जो उलंघन करता है वह अयोग्य |
 
परमात्मा का आदेश क्या है ? आत्मवत सर्व भूतेषु = सभी प्राणी को अपने समान मानना | संसार का उपकार करना शारीरिक आत्सिक और सामाजिक उन्मति करना | अपनी उन्ननि में संतुष्त न रहना किन्टु सबकी उन्तति को अपनी उन्ननि समझना | सबके साथ प्रीती पूर्वक धर्मानुसार यथा योग्य वरतना |
क्या यह उपदेश अल्लाह के पास है ? अगर नहीं है तो फिर अल्लाह और ईश्वर एक कैसे ? महेन्द्र पाल आर्य -25 जुलाई 22

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