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इस्लाम में व्यक्ति पूजा की परम्परा ||

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इस्लाम में व्यक्ति पूजा की परम्परा ||
हजरत उमर ने मक्का मुयाज्जेमा में खुतबा देते हुए फरमाया, कि तुममें से कोई शख्स जब हज करने के लिए आये तो उसे चाहिए कि खाना ए काबा के गिर्द सात चक्कर लगाये। फिर मकामे इब्राहीम पर दो रकात नमाज पढ़े, फिर सफा से अपनी सयी का इब्तेदा करे। किबला रुख होकर खड़ा हो जाये, सात मर्तबा अल्लाहुअकबर कहे। हर दो तक्बिरों के दरम्यान, अल्लाह ताला की हम्द व सना बयान करे। नबी करीम सल्लाल्लाहु अलैहे वसल्लम पर दरुद भेजें और अपने लिए जो दुआ मांगना चाहें मांगे। फिर मरवाह पहाड़ पर भी इसी तरह दुवा मांगे।
 
ध्यान से सुनते जाना और देखते जाना कि सिर्फ अल्लाह ही नहीं बल्कि रसूल की इतायत करने की बात किसप्रकार से कही जा रही है। सिर्फ अल्लाह को मानने की बात इस्लाम में नहीं है। एकेश्वरवाद इस्लाम में है कहाँ यही तो भेद धर्म और मजहब में है। जो मैं पहले से बताता आ रहा हूँ। मजहब के जन्मदाता को मजहब के माननेवाले छोड़ ही नहीं सकते और धर्म में परमात्मा के सिवा आप किसी को जोड़ ही नहीं सकते। यह अंतर है धर्म और मजहब में। जिस भेद को मजहब वाले जानते तक नहीं। अल्लाह के साथ साथ अल्लाह के रसूल को भी मानने की बातें कहाँ कहाँ है देखें |
وَأَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ١٣٢
اور اللہ اور اس کے رسول کی اطاعت کرتے رہو تاکہ تم پر رحم کیا جائے
तथा अल्लाह और रसूल के आज्ञाकारी रहो, ताकि तुमपर दया की जाये। 3,132
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ وَأُو۟لِى ٱلْأَمْرِ مِنكُمْ ۖ فَإِن تَنَـٰزَعْتُمْ فِى شَىْءٍۢ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌۭ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا ٥٩
مومنو! خدا اور اس کے رسول کی فرمانبرداری کرو اور جو تم میں سے صاحب حکومت ہیں ان کی بھی اور اگر کسی بات میں تم میں اختلاف واقع ہو تو اگر خدا اور روز آخرت پر ایمان رکھتے ہو تو اس میں خدا اور اس کے رسول (کے حکم) کی طرف رجوع کرو یہ بہت اچھی بات ہے اور اس کا مآل بھی اچھا ہے
हे ईमान वालो! अल्लाह की आज्ञा का अनुपालन करो और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो तथा अपने शासकों की आज्ञापालन करो। फिर यदि किसी बात में तुम आपस में विवाद (विभेद) कर लो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर फेर दो, यदि तुम अल्लाह तथा अन्तिम दिन (प्रलय) पर ईमान रखते हो। ये तुम्हारे लिए अच्छा[ और इसका परिणाम अच्छा है। 4/59
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا۟ إِلَىٰ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَإِلَى ٱلرَّسُولِ رَأَيْتَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًۭا ٦١
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا۟ إِلَىٰ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَإِلَى ٱلرَّسُولِ رَأَيْتَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًۭا ٦١
तथा जब उनसे कहा जाता है कि उस (क़ुर्आन) की ओर आओ, जो अल्लाह ने उतारा है तथा रसूल की (सुन्नत की) ओर, तो आप मुनाफ़िक़ों (द्विधावादियों) को देखते हैं कि वे आपसे मुँह फेर रहे हैं। 4/61
مَّن يُطِعِ ٱلرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ ٱللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًۭا ٨٠
جس نے اطاعت کی رسول کی اس نے اطاعت کی اللہ کی اور جس نے روگردانی کی تو ہم نے آپ کو ان پر نگران بناکر نہیں بھیجا ہے
जिसने रसूल की आज्ञा का अनुपालन किया, (वास्तव में) उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया तथा जिसने मुँह फेर लिया, तो (हे नबी!) हमने आपको उनका प्रहरी (रक्षक) बनाकर नहीं भेजा[ है। 4/80
لِّتُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًا ٩
تاکہ (مسلمانو) تم لوگ خدا پر اور اس کے پیغمبر پر ایمان لاؤ اور اس کی مدد کرو اور اس کو بزرگ سمجھو۔ اور صبح وشام اس کی تسبیح کرتے رہو
ताकि तुम ईमान लाओ अल्लाह एवं उसके रसूल पर और सहायता करो आपकी तथा आदर करो आपका और अल्लाह की पवित्रता का वर्णन करते रहो, प्रातः तथा संध्या। 48/9
यह सभी प्रमाण कुरान में मौजुद है की सिर्फ एक अल्लाह को मानने और उसे पाने की बातें नहीं है बल्कि अल्लाह के साथ साथ रसूल का पाना भी जरूरी है, रसूल को बिना पाए कोई अल्लाह को नहीं पा सकता | सिर्फ पाने वाली बात भी नहीं है उसकी तस्बीह और तहलील करने की बात भी कही गई है | अर्थात रसूल के नाम का माला भी जपना पड़ेगा तभी कोई मुसलमान हो सकता है |
जो मात्र अपने रसूल कि इतायत के जरिये ही अल्लाह से अपने गुनाहों कि माफी हज में जाकर करना होता है। तो जहाँ अल्लाह को छोड़ और कोई बंदगी के लायक नहीं, तो अल्लाह के नाम के साथ किसी मानव का नाम होना शिर्क नहीं? जबकि वंदेमातरम का अर्थ यह नहीं कि हम किसीके पास सर झुकाएं, या परमात्मा को छोड़ किसी और कि इबादत करें आदि। यह सिर्फ विरोध करना है बस और कुछ नहीं। रही बात एकेश्वरवाद की तो जहाँ अल्लाह के साथ किसी,का नाम जुड़ा हो तो फिर वहदहू ला शरीक की बात ही कहाँ है? एक और विचित्र बात आप लोगों से कह रहा हूँ, बुखारी शरीफ हदीस 1541, किताबुल मनासिक।
 
हजरत आयेशा से रवायत हैं कि मैं हज के दौरान मक्का में आई, मैंने तवाफ काबा का नहीं किया और सफा मरवा तवाफ कर लिया था। मैंने हुजूर से शिकायत फरमाई तो फरमाया। तुम इसी तरह करो जिसतरह और हिजाज कर रहे हैं, अलबत्ता तहारत हासिल न होनेतक तवाफे काबा न करो।
 
व्यक्ति पूजा कि परम्परा किस प्रकार है देखें! हजरत आयेशा रजस्वला में थीं यह बात को खोलने में संकोच नहीं किया। लोकाचार इस बात की क्या जरूरत थीं की हजरत आयशा रजस्वला में थीं यह बात भी दुनिया के लोगों में बताने की क्या जरूरत ? अगर कोई कहें की औरों को शिक्षा देने के लिए | तो केवल मन करदेने से भी तो बात बन जाती की महिलाएं जब इस हालात में हों तो उन्हें हज के समय यह, यह,चीज नहीं करनी है | महेन्द्र पाल आर्य 15 /अगस्त 22

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