Vaidik Gyan...
Total:$776.99
Checkout

ऋषि कि तुलना किस से की जाये |

Share post:

ऋषि की तुलना किन से की जाये?
भारत में अनेकों महापुरुषों ने जन्म लिया,धार्मिक सामाजिक,या राजनीतिक,और सबने सुधार का ही काम किया | सबने अपने अपने हिसाब से काम किया है एक से बढ़ कर एक ने काम किया है, सबने अपने हिसाब से समय के अनुसार काम किया है | किन्तु मै जब उनलोगों के साथ ऋषि दयानन्द का काम को देखता हूँ, तो मुझे लगता है भारत वासियों ने सत्य अ सत्य को नहीं देखा,और न ही इन्हें सही और गलत का निर्णय लेना आया |
लोग समझेंगे छोटी मुहमे बड़ी बात करने लगे, तो आयें हम निष्पक्ष हो कर बिना भेद भाव के विचार करें और सत्य को ग्रहण कर असत्य को त्यागें,जो मानवता का एक पाठ है |
सबसे पहले मै भीष्म पितामः के साथ मिला कर देखता हूँ ऋषि को,कारण यह महाभारत के प्रमुख पात्रों में गिने जाते हैं | और लोगों की मान्यता है भीष्म पितामः बड़े धार्मिक थे, मैंने नजदीक से जाननेका प्रयास किया,तो मुझे लगा की लोग बड़े भोले हैं, सही और गलत का निर्णय लेना ही नहीं आया |
भीष्म ब्रह्मचारी थे दयानन्द भी, भीष्म ने ब्रह्मचारी का व्रत लिया तो.सिर्फ अपने पिता की शादी सत्यवती से कराने के लिए |
दयानन्द ने ब्रह्मचारी का व्रत लिया सम्पूर्ण मानव समाज को परमात्मा एक है,वेद परमात्मा का दिया ज्ञान मानव मात्र के लिए है, बतानेके लिए |
भीष्म जी ने विवाह न करने की प्रतिज्ञा लेकर भी चले गए काशी नरेश की बेटियों के स्वयंबर में | अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका,जैसों के स्वयंबर में ब्रह्मचारी का क्या काम था ?
दयानन्द के विद्या अद्धायाण काल में एक माता के चरण छुने पर सीना तक पानी में उतरकर,प्रायश्चित करना ,कारण जिस आश्रम वालों को नारी का स्पर्श ही वर्जित है उसे ध्यानरखना.भीष्म का याद न रहना |
भीष्म जी के धर्म उपदेश को माता द्रौपदी ने टोक दिया, की उस वक़्त आप का धर्म उपदेश कहाँ था जब भरी सभा में मेरा अपमान किया जा रहा था ? तो जवाब मिला की मैंने तो कौराबों के अन्य खाए हैं उससे हमारा रक्त ही गलतबनगया,और मै धर्म उपदेश नहीं दे सका |
यानि धर्म उपदेश देने से भीष्म जी को रोका कौराबों के अन्य ने, तो दूसरी ओर दयानन्द को धर्म उपदेश देने से नहीं रोक पाया अलवर नरेश के अन्य ने,तो तप भीष्म का माना जाये या दयानन्द का ?
भारत हो या दुनिया के लोग,महात्मा कहते हैं गौतम बुद्ध को,जो की वेद को नहीं माना.परमात्मा को भी नहीं माना | मनु महाराज लिखते हैं नास्तिको वेदनिन्दकः
=यानि जो वेद की निन्दा करे अथवा वेद को न माने वह नास्तिक है |
एक नास्तिक को लोगों ने महात्मा तो कहदिया,किन्तु जो दयानन्द मानव मात्र को धर्म के साथ जोड़ा उन के नाम ही सम्पूर्ण भारत के लोग नहीं जानते | गौतम बुद्ध ने लोगों को अहिंसा परमो धर्म:का पाठ पढ़ाया,पर कुमारिल भट को पहाड़ के ऊपर से नीचे गिराकर मारा,क्या यह हिंसा नहीं ?
दयानन्द ने अपने विष देने वालेको धन देकर बताया नेपाल चला जा बच जायेगा, फिर अहिंसा के पुजारी कौन ?
गौतम बुद्ध के मिथ्या अहिंसावाद ने म्याह्मार में बौद्ध सन्तानों को इस्लाम कुबूल करवा दिया,तो इन्ही बौद्ध संतानों को अबसर मिलते ही गिन,गिन कर 800 बौद्ध प्रतिमाओं को तोड़ दिया |
दयानन्द की मान्यता है सबके साथ प्रीति पूर्वक धर्मानुसार यथा योग्य वर्तना चाहिये | यह होता तो बौद्ध संतानों को इस्लाम कुबूल करना ही नहीं पड़ता |
हज़रत ईसा मसीह को भी ईसाई महात्मा कहते है, जिस को सूली पर चढ़ाते समय चिल्ला ते हुए कहा इल्ला इल्ला लेमा सबक्तानी, एय गॉड मै तुझको याद करना भूल गया हूँ |
इसीका ही नक़ल आर्य समाजियों ने किया है दयानन्द के नाम की परमात्मा तेरी इच्छा पूरी हो,यह बात ही गलत है,जब परमात्मा इच्छा आदि गुणों से रहित है तो दयानन्द यह किसलिए कहते ?
बल्कि ऋषी ने परमात्मा का शुक्रिया अदाकी,और कहा मै तेरा धन्यवाद करता हूँ | यही शब्द सुनकर गुरुदत्त विद्यार्थी आस्थावान ईश भक्त,वैदिक मान्यता को स्वीकार करने वाले बन गयेथे |
लोगों ने मोहोनदास करमचंद गाँधी को भी महात्मा कहा, यहाँ तक की भारत में एक रुपया से लेकर हज़ार के नोट में भी उनके चित्र छापा है |
थोडा विचार करते हैं कहाजाता है की गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे, जो की मरने से दस दिन पहले मदनलाल पाहवा ने बम फेका निशाना चुक गया,गाँधीजी बच गये |
गांधीजी अहिंसावाद पर अमल नहीं किया और पाहवा को जेल भुगतना पड़ा,क्या यही अहिंसावाद है ? फिर दस दिन बाद जब नाथूराम ने गोली मारी तो उसे भी फासी पर लटकाया गया,कहा है अहिंसा ?
दयानन्द ने जहर देने वाले को छोड़ा क्या वह अहिंसा नहीं ? गांधीजी गाय का दूध नहीं पीया कहा यह अपने बच्चे के लिए दूध देती है,तो दूध पीया बकरी का |
विचार शील लोग विचार करें की गाय अपने बछड़े के लिए दूध देती है,तो बकरी किसके लिए दूध देती गाँधी के लिए ?
जहाँ तक हक मारने की बात है तो गाय एक ही बच्चा देती है,और बकरी चार, गाँधी ने एक का हक तो नहीं मारा चार का मार दिया |
ऋषि दयानन्द ने प्राणी मात्र के भलाई के लिए वायु मंडल को शुद्ध कर सभी प्रकार के पौष्टिक पदार्थों को अग्नि में डाल कर यज्ञ के द्वारा प्राणी मात्र को पहुचाने की बात की,अहिंसा किसका हुवा?
हो सकता है दुनिया में कोई भी महात्मा कहलायें हों पर धर्मात्मा दयानन्द को ही कहा गया | स्वामी विवेकानन्द को लोगों ने दुनिया के कोने कोने तक पहुचा दिया, जो की धर्म को जानते तक नहीं थे, संस्कृत को भी नहीं जानते थे आहार भी जिनका शुद्ध नहीं था | लोग उनके लिए कहते हैं चिकागो में उनहोंने धर्म का डंका बजाय, यह एक भ्रामक प्रचार है जब की उनको बोलने के लिया चार विषय दिया गया था जो वेद सम्मत ही था. जिस को विवेकानन्द ने छुकर भी नहीं देखा |
1 – वह धर्म कौनसा है. जो बराबरी का दर्जा देता हो मानव समाज को |
2 – वह धर्म कौनसा है, जो भाई चारे का पाठ पढ़ा ता हो =
3 = वह धर्म कौन सा है जो मानव मात्र का सर्वागीण विकास की बातें करती हो ? 4 = वह धर्म कौन सा है जो विज्ञानं सम्मत हो |
जो यह सारा वेद का ही विषय था स्वामी विवेकानन्द जी ने इस पर बोला नही, और भारत की भुखमरी का ही उजागर करते रहे | उनको यह मालूम ही नहीं था की हम जब धरती पर नहीं आये तो परमात्मा ने हमारी खोराक माँ के आँचल में दूध हमारे आनेसे पहले भेज दिया | हमारे मांगने से पहले भेजा,ज़रूरत से ज्यादा भेजा,हमारे आनेसे पहले भेजा |
दयानन्द इस भेद को वेद से निकाल कर परमात्मा को जान कर,धर्म को जान कर ही दिया था |
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने वैदिक धर्म को छोड़ा जो मानव मात्र का धर्म है, उस से अलग होकर बौद्ध जो एक मत है उसको अपनाया | और मानव समाज को बांटने का काम किया. जैसा इस्लाम और ईसईयत ने बांटा है |
गौतम बुद्ध अगर आज तक सिद्धार्थ बने रहते तो यह बौधिष्ट कैसे बनते ? जिन्होंने धर्म को जाना तक नही, ऋषि दयानन्द ने मनुष्य मात्र का धर्म एक है कहा सब को वेद के साथ,जोड़ कर मानव मात्र का चहुमुखी बिकास की बातें की | संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य कहा | शारीरिक, आत्मिक,और सामाजिक उन्नति की बात की,अपनी उन्नति में संतुष्ट न रहकर सबकी उन्नति को अपनी उन्नति माना |
सम्पूर्ण मानव समाज को एक वेद रूपी धागा में पिरोने का प्रयास किया | की जिन्हों ने मानव समाज को विभाजित किया जन्मसे जाति माना और धर्म के नाम से हिन्दू को हिन्दू से ही गाली दिलवाया | जो तिलक,तराजू, और तलवार, इनके मारो जुते चार कह कर मानव समाज में विष घोलने का काम किया, लोग उन्हें पूजने लगे, जो ऋषि दयानन्द ने सम्पूर्ण मानव समाज एक ही परमात्मा के सन्तान होने की बात कही,पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब माना | फिरभी दयानन्द को भारत वासी जान ही नहीं पाए,क्या यह भेद भाव नहीं ?
अब देखें इस्लाम वाले अभिमान करते हैं की दुनिया को एकेश्वरवाद का पाठ हमने सिखाया, यह दयानन्द ने किस प्रकार इस को गलत सिद्ध किया | की अगर धरती पर कहीं एकेश्वरवाद है तो मात्र वेदमें ही है, उससे बाहर, कहीं नहीं- ला इलाहा इललाल्लाह, तक तो ठीक है की नहीं है कोई उपासक एक परमात्मा को छोड़,जो आदि में वेद के माध्यम से परमात्मा ने मनुष्य मात्र को उपदेश दिया |
किन्तु मुस्लमान तो कोई तभी हो सकता है, जब कोई- मुहंमदुर रसूलल्लाह कहे ,यानि मुहम्मद अल्लाह का रसूल है |
यह ज़ब तक कोई नहीं कहता तो वह मुस्लमान नहीं हो सकता | तो मुहमम्द को छोड़ कोई मुस्लमान नहीं बन सकता | जो अल्लाह के नाम से मुहम्मद का नाम जुड़ा है, पर परमात्मा के नामके साथ किसी का नाम जुड़ ही नहीं सकता,तो एकेश्वरवाद कहाँ है ?
दूसरी तरफ मुहम्मद साहब के फौत [मरने] के बाद उनका मजार बनाया गया,जो आज भी हज करने को मुसलमान जाते हैं जिस का चक्कर लगाना पड़ता है | इधर दयानन्द मृत्यु शय्या में उप देश दे रहे हैं आर्यों को की मेरी समाधी न बनाना,यह शरीर जलकर जो राख बने किसी गरीब के जमींन में छिट देना वह खाद का काम होगा,समाधी बनानेसे लोग फुलचढाने और चादर व धुप धुनी भी लगायेंगे, यह काम न करना,फिर कौन एकेश्वरवादी थे ?
न मालूम लोगों ने गाँधी को नोटों में किस लिए लगाया, जिसको थूक लगाकर गिनते हैं, दयानन्द इससे दूर हैं |

Top