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ऋषि दयानन्द जी ने आर्य समाज बनाकर राष्ट्र का उत्थान चाहा |

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ऋषि दयानन्द जी ने आर्य समाज बनाकर राष्ट्र का उत्थान चाहा |
ऋषि दयानन्द जी ने धरती पर विचरण करने वाले मानव मात्र के उत्थान के लिए ही आर्य समाज को जन्म दिया |
मानव मात्र को कर्तव्य का बोध कराया कि तुम्हारा नाम मानव क्यों पडा, मानवों में और दानवों में अंतर क्या है मानवों का दायित्व किया है उसका बोध कराते हुए धर्म के साथ मानव मात्र को जोड़ा | मानव मात्र को धार्मिक बनाने का प्रयास किया इसके बिना मानव मानव नहीं बन सकता, मानवों के लिए परम कर्तव्य है धर्म को जानना उसपर आचरण करना प्रत्येक मानव कहलाने वालों का दायित्व है | इससे अलग होना मानवता का उलंघन है ऐसा किसी भी मनुष्य के लिए नहीं होना चाहिये |
ऋषि ने इन्ही मानवों को दिशा निर्देश किया, आर्य समाज में तीन सभाएं बनाने का उपदेश दिया | 1 = धर्मार्य सभा = 2 = विद्यार्य सभा = 3 = राजार्य सभा |
आर्य समाज सिर्फ भारत की बात नहीं करता, सम्पूर्ण मानव जगत के उत्थान के लिए ऋषि ने यह व्यवस्था दी है | धमार्य सभा धर्म का प्रचार करें, मानव मात्र को धर्म का बोध कराये, धर्म के साथ मानव मात्र को जोड़े, धर्म को मानव मात्र के जीवन में प्रधानता ऋषि ने दिया है |
विद्यार्य सभा के माध्यम से मानव मात्र के लिए पठन पाठन की विधि क्या हो, कैसी हो उसपर बल दिया कोई भी विद्या से वंचित न रह जाये | एक राजा का पुत्र और देश के एक गरीब का पुत्र दोनों को एक ही शिक्षा एक प्रकार का भोजन वस्त्रादि से लेकर कोई भेद न हो इस प्रकार की व्यवस्था ऋषि ने बतलाई है |
और देश चलाने के लिए राजार्य सभा के माध्यम से सारी व्यवस्था किया जाय, देश चलाने वाले को प्रथम धार्मिक होना जरूरी बताया है, राजा अगर धार्मिक न हो तो देश चलाना सम्भव न होगा | जैसा चीन में हो रहा है दुनिया देख रही है किस प्रकार भेदभाव पूर्ण व्यवहार अन्य लोगों के साथ करता है |
ऋषि ने बताया इसलिए राजा को धार्मिक होना जरूरी है राज़ा को धर्म का जानकार होना बहुत जरूरी है भेद भाव से बहकने का एक मात्र साधन है धर्म | कारण किसी के साथ अधर्म न होने पाए न्याय पूर्ण व्यवस्था अन्याय से दूर सबके साथ प्रीति पूर्वक धर्मानुसार यथा योग्य समानता होनी चाहिए | हर कोई काम को धर्मानुसार ही राजा करें, राजा के पास अपना पराया का भेद न हो आदि |
संसार का उपकार ही राजा का उद्देश्य होना चाहिए, कोई भी मानव कहलाने वाले अपनी उन्नति में सन्तुष्ट न रहकर सबकी उन्नति को अपनी उन्नति समझें | यह सभी बातें ऋषि ने आर्य समाज के नियम में भी लिखा है |
परन्तु जो लोग आर्य समाज में अधिकारी बनकर बैठ गये उन्होंने ऋषि के सारे नियम को ताक पर रख दिया है | नियमों से किसी का कोई भी लेना देना नहीं है सब अपने अपने स्वार्थ सिद्धी में लगे हैं, जो जहाँ बैठा है वह किसी और को आने देना नहीं चाहते, वह जीवन भर के लिए उस कुर्सी को चिपक गए हैं अपना दलगत राजनीति करते हुए ऋषि दयानन्द जी के उद्देश्य की तिलांजली दिया है |
ऋषि ने जो राजार्यसभा की बात बताई है और अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश का एक समुल्लास लिखा है 6 = इसमें व्यवस्था लिखी ऋषि ने, की राज़ व्यवस्था कैसी हो, राजा कौन बने, राजा में योग्यता कैसी हो इस समुल्लास में बहुत सुन्दर तरीके से ऋषि ने समझा दिया | 1875 में आर्य समाज की स्थापना करके एक एक चीज को ऋषि ने आर्य जनों को समझाया है | किन्तु स्वार्थी और पदलोलुप लोगों ने ऋषि की एक भी न मानी और अपना मनमानी करते हुए आर्समाज को इस दशा में पहुंचा दिया |
कोई किसी की बात मानने को तैयार नहीं सारा नियम और उपनियम को ताक पर रख दिया और एक आदमी दो तीन जगह सदस्य बने हुए हैं | जब की नियम है एक आदमी एक जगह ही सदस्य रह सकता है, पैसों के लिए यह सारा अनर्थ करते आर्य समाजी, कोई नहीं है इन्हें बताने वाले सुधारने वाले सब जगह आज पैसों की राजनीति हो रही है | और पैसों के बल पर कोई प्रधान और कोई मंत्री बने हुए हैं | बहुत बातें है मैंने थोड़ी सी जानकारी आप लोगों को दी, आर्यसमाज की दशा और दिशा |
महेन्द्र पाल आर्य =19/10 /22

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