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चुनाव की सरगर्मी -आखिर चुनाव किस लिए ?

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चुनाव की सरगर्मी – आखिर चुनाव किसलिए ?

चुनाव का अर्थ है चुनना, क्या चुनना, किसको चुनना यह सम्पूर्ण राष्ट्र में रहने वालों का दायित्व ही नहीं बल्कि कर्तबव्य भी है ? हमारे देश में कई बार कई प्रकार की चुनाव होती है, जैसा पंचायत की चुनाव,बिधान सभा की चुनाव, और लोकसभा की चुनाव, राज्यसभा की चुनाव, फिर राष्ट्र पति की चुनाव, आदि |

यह हमारी देश की एक स्वस्थ परम्परा है,की जिसमे हम अपने पंचायत से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र तककी उन्नति किस प्रकार कर सकते है,यह भावना जूडी हुई है | कारण यही तो अबसर है की हमारे नेता या संचालक,याअधिनायक, जिनको हमसब ने अपने पंचायत से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र को किस प्रकार उन्नति के शिखर पर ले जाया जा सकता है यही उद्देश्य होता है |

 

जिसमें प्रत्येक राष्ट्रवासी.की सहभागिता रहती है | चुनने का सिर्फ और सिर्फ ध्यान होता है उन्नति, कौन हमारे नेता है जो हमारी पंचायत से ले कर राष्ट्र की उन्नति करते कराते हुए इस राष्ट्र को आगे ले जासकते हैं |

 

यह दायित्व समग्र राष्ट्र वासियों को है जो इस राष्ट्र में रहते है, अब राष्ट्र की उन्नति वही चाहेगा जो इस राष्ट्र को अपना मानता है | कारण अगर अपना मानेगा तो तभी वह इसकी उन्नति चाहेंगे | और इसी में यह भी अबसर मिलता है पहचानने का, की इस राष्ट्र को कौन अपना मानता है |

 

कारण हमारे इस राष्ट्र में ऐसे भी लोग रहते हैं, जिनका ध्यान ईरान,पाकिस्तान की ओर है, तो किसी का ध्यान रशिया,और चीन की तरफ है | इसी राष्ट्र में सभी मत पंथ और संप्रदाय के लोग हैं, जिन्हें सम्पूर्ण अधिकार है अपने नेता चुनने का |

 

ध्यान रहे नेता चुनेंगे आपने लिए नहीं, किन्तु देश हित के लिए, राष्ट्र हित के लिए | अब नेता भी सबकी उन्नति में अपनी उन्नति है, को अपने जीवन का अंग बना लेता और लेना ही चाहिए | इसका जो मूल कारण है वह यह है की हमारे यहाँ राजनीति नहीं राज धर्म है | जो हम मर्यादा पुरषोत्तम रामसे, योगेश्वर कृष्ण से भी ले सकते हैं, जो इस भारत की वैदिक संस्कृति रही है |

 

हमें लिखने में कोई संकोच नहीं, की आज हमारे देश में सब उल्टा ही हो रहा है | यहाँ भारत में राजनीति एक व्यापर में परिवर्तित हो गया है, जो पंचायत से लेकर राष्ट्र हित जिनका उदेश्य था, अब वह व्यक्तिगत हित हो गया, जहाँ राष्ट्र की उन्नति थी वहां अपनी परिवार की उन्नति समझने लगे |

 

जिस कारण राज धर्म न होकर राजनीति होने लगी, और परिवारवाद से लेकर अपनी उन्नति को ही लोगों ने अपना उद्देश्य मान कर, छोटी, छोटी, पार्टी बनाकर अपने परिवार के लोगों को ही टिकट देने लगे, और उस टिकट के नाम से लोगों से मोटी रकम भी वसूलने लगे, जिस कारण अब इनलोगों की राजनीति में योग्यता नहीं देखि जाती, मात्र कौन कितना नोट दे सकता है यही उदेश्य रह गया है | और इस नोट की राजनीति में जो नोट लगा कर चुनाव में आये हैं उन्हें तो अपनी नोट को उसुलने की ही चिन्ता होगी अथवा रहेगी | अब वह भी असल और सूद दोनों ही उसुलने में लगते हैं |

 

यह है वर्तमान भारतीय राजनीति का परिदृश्य जो सामने सब को देखाई दे रही है, जहाँ राष्ट्र को उन्नत बनाने का कसम खा कर लोगों के सामने गिड़ गिड़ायाथा.अब उन्ही लोगों को ऑंखें दिखाने लगते हैं, की जिनके मतदान से यही नेता वहां तक पहुचे है |

फिर वह भूल जाते हैं पांच {5}वर्ष के लिए उन्ही जनता को, की जिन्हों ने उन्हें अपना कीमती वोट देकर उस लायक बनगा है | आज इस वोट की राजनीति में अच्छे बुरे की पहचान नहीं है, सिर्फ बाहूवली को या फिर -समाजमे जो आतंक फैला सके जो गुंडा गर्दी कर सके ज्यादा अधर्म का काम कर सके समाज को धोखा दे सके, अराजकता फैला सके वही लोग आज भारत वर्ष में समाज का प्रतिनिधि हैं |

 

जो लुट खसोट करसके, घोटाला करसके, अपनी कई पीड़ी को मालामाल कर सके, आज के जन प्रतिनिधि उन्हें बनाया जा रहा है, और यह भारतीय राजनीति पार्टी इससे कोई भी अछुता नहीं है | आज तो उन्हें नहीं पूछा जाता, की जिन्होंने अपने खून से इस भारत को कभी सींचा हो |

 

अथवा उन्हें यह राजनेता जानना ही नहीं चाहते की जिनहों ने अपने जिगर के टुकड़े को इस देश की रक्षा के लिए कभी सरहद पर प्राणों की बाजी लगाई हो |आज तो समाज के अधिनायक वही हैं जो समाज विरोधी, धर्म विरोधी,मानवता विरोधी हैं, उन्ही को आज सभी राजनीति पार्टी टिकट दे रही है | इस कारण देश हित,समाज हित, मानवता हित, सब को अलग कर सिर्फ अपने हित में कार्य करने लगे हैं |

 

जिस दयानन्द के बनाये बताये आर्य समाज ने सारा काम राष्ट्र हितमे किया सबसे ज्यादा वलिदान भी दिया, जिस कारण कभी इस चुनाव के राजनीति में लोगों ने उनके चरित्र के वलपर कभी बिधानसभा और लोकसभा, में भी अपने राष्ट्र हित पर वक्तव्य दे कर सम्पूर्ण सदन को मन्त्र मुग्ध करते थे, आज किसी भी राजनीति पार्टी ने ऐसों को टिकट देना उचित नहीं समझा |

 

आज की राजनीति पार्टी अपना टिकट उन्हें देती है जो की भारतीय संबिधान का शपत ले कर भी उस संबिधान की धज्जियाँ उसी सदन में उड़ा रहे हैं | अभी कुछ दिन पहले सम्पूर्ण जगत वासियों ने देखा,की बन्देमातरम् गाते समय किस प्रकारसे यह बसपा नेता मुहम्मदशाफिकुर्रह्मान,मियां लोकसभा से उठ कर.बाहर निकल रहे हैं |

 

सभाध्यक्ष के रोकने पर भी नहीं रुके,और कहरहे हैं मै हमेशा ऐसा ही करुगा | मेरा सवाल होगा की जब यह लोकसभा सदस्य बने थे और उन्हें जो शपत दिलाई गयी थी क्या उसमे यह बात नहीं थी, की मै इस संबिधान को मानूंगा ?

तो फिर उठकर जाना क्या दंडनीय अपराध नहीं ? इसका जवाब किस राजनीति पार्टी के पास है ? इस मानसिकता वालों को राष्ट्र वादी कहेंगे अथवा राष्ट्र विरोधी ?

 

भारतीय जनता किससे पूछे इस बात को कौन दें इसका जवाब ? अब सभी पार्टियाँ साम्प्रदायिकता मिटाना चाहते,तो धरती पर जबतक यह सम्प्रदाय वाद है, तब तक तो सम्प्रदायिकता रहेगी | अगर सम्प्रदायिकता को मिटाना है तो पहले यह सम्प्रदायवाद को मिटाना जरूरी है, जब तक यही सम्प्रदायवाद है धरती पर तबतक इस सम्प्रदायिकता को समाप्त करना संभव नहीं |

 

इसे ध्यान में रखते हुए अगर राष्ट्र को विकाषशील बनाना है और मानवता की रक्षा करनी है तो,सभी प्रकार के सम्प्रदायवाद को समाप्त कर ही हम मानवता की रक्षा कर सकते हैं,और इस राष्ट्र की भी रक्षा कर सकते हैं |

 

इस कार्य में रूचि रखने वाले आज ही प्रतिज्ञा करें और राष्ट्र हित में राष्ट्र को जो अपना समझता है इस राष्ट्र के हित मे जो अपना समय लगा कर देश की उन्नति को अपना उन्नति समझता है ऐसों को अपना नेता बनाकर ही अपने को राष्ट्र वादी कहें और कहलायें |                              महेन्द्रपाल आर्य -21 \12 /20

 

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