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जन्माष्टमी हम किनका मना रहें है ?

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर यह लेख मैंने पिछले 2014 को लिखा था | किसी ने मुझे याद दिलाया है मेरे होम पेज में डाल कर – जिसे मैं आप सभी को याद दिला रहा हूँ |
जन्माष्टमी हम किनका मना रहे हैं ?
आज पुरे देश में ही नही अपितु सम्पूर्ण जगत में यह पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा हैं | मनाने का ढंग, तरीका विभिन्न जगहों में अलग-अलग है,कहीं तो कैसे कैसे गीत गए जा रहे है, गोबिन्द आला रे, कहीं गोपाल बोलो गोबिन्द हरी बोलो गोपाल बोलो और भी न मालूम कैसे-कैसे गीत गाये जा रहे हैं गाये जाते रहे हैं, और गाये जाते रहेंगे | इसका उद्देश्य क्या है, ख़ुशी मनाना,इस ख़ुशी से मिलना क्या है ? इसका जवाब न किसी ने जाना है और न जानने का प्रयास किया है, एक बात और भी है की इनको बताने पर भी यह मानते नहीं ? आज इस विज्ञान के युग में मानव कहलाने वाले हर बात को तर्क के कसौटी में परखने के बाद किसी काम को करते है | किन्तु यहाँ देखें की लोग तर्क को या फिर दिमाग में किस प्रकार ताला डाल कर काम कर रहे हैं और कहते हैं की हम बुद्धिमान है, हमने तर्क के कसौटी पर दुनिया को दिखा दिया की हम क्या नहीं कर सकते |
अब प्रश्न है की इस जन्माष्टमी के दिन विभिन्न प्रान्तों से लोग मथुरा उ० प्र० में किस तरह झूम रहे हैं, गा रहे हैं, नाच रहे हैं, इसका उद्देश्य क्या है ? एक ही जवाब आ सकता है की हम ख़ुशी मना रहे हैं, श्रीकृष्ण मूर्ति का दर्शन कर रहे हैं | अब सवाल है की इससे मिलना क्या है,तो जवाब यही मिलेगा की पुण्य मिलेगा | अगर आप किसी से पूछेंगे की वह पुण्य क्या है, जो मिलेगा ? फिर जवाब यही मिलना है की बहुत सारे लोग आ रहे थे हम भी चले आये | अब यह कौन सी बुद्धिमानी है भाई, कोई कुछ भी करे तो हमें भी वही करना है ? और बातों में तो औरों की देखा देखी काम नही करते ? जैसा कुछ लोग पश्चिम दिशा में मुंह कर उपासना करते, आप तो ऐसे नहीं करते हैं ? आप कहेंगे की हम उनके साथ नहीं, आप जिनके साथ हैं उनमे कोई हनुमान जी को मानते, बजरंगबली को मानते, पर आप तो कृष्ण को मानते | आप वाले ही, कुछ जय श्रीराम, कहते, पर आप तो जय श्रीकृष्ण बोलते हैं | यह भिन्नता किसलिए ? यहाँ भी जवाब मिलेगा लोग करते हैं | भाई लोगों अभी तो अकल की बात चल रही थी की हम अकल मंद है, तो आप की वह अकल मंदी कहाँ चली गयी ? आप दुसरे का नक़ल कर रहे और अपने आपको अकलमन्द कह रहे हैं | पर यहां बात क्या है वह देखें –की पुण्य मिलती है परोपकार से, यानि जिस काम को करने से किसी प्राणी का उपकार हो उस कम को करना पुण्य है | अब बताएं की मथुरा में नाचने गाने से किस प्राणी का क्या उपकार हो रहा है ? किसी के पास कोई जवाब नहीं है किन्तु किये जा रहे हैं | पुण्य का काम तो वह होता की जो धन लगाकर आप मथुरा पहुंचे उसी धन को आज श्रीकृष्ण जी के जन्म दिन में किसी गरीब को वह धन देते –किसी अनाथालय में वह धन लगाते, किसी अपाहिजों को वह धन देते तो आज आपका जन्माष्टमी पर्व मनाना सफल होता |
कैसे तो यह शिक्षा भी आपको वह श्रीकृष्ण जी से ही मिलना संभव है, श्रीकृष्ण के जीवन से किसी भी बात को लेते जो उनके जीवन में हम देखते है उसे अपने जीवन में उतारते आचरण में लाते –जैसा योगेश्वर कृष्ण ने सुदामा के साथ किया | की सुदामा को पता भी लगने नहीं दिया की यह मकान उन्ही का है, इसका नाम है दानेषु जो यज्ञ की शिक्षा है | अगर सही मे आप जन्माष्टमी मना रहे है तो उन्ही कृष्ण के जीवन से किसी एक, उनके आचरण को अपने जीवन में उतारते तो यह उत्सव मनाना सफल हो जाता |
हमने तमाशा बनाया है उनसे लिया कुछ नही, दोष उनपर और लगा दिया,मटकी फोड़ने का | भाई लोगो उनके जीवन में समय कहाँ मिला रंग रलियाँ मनाने का? कारण जिनका जीवन जन्म से ही संघर्षमय रहा और समाज के कुरीतियों को मिटाने और विरोध करने में लगा फिर यह बुराई उनके जीवन में आना उचित कैसे होगा? जिनका जन्म एक विषम समय और परिस्थिति में हुआ, की जन्म लेते ही मौत के हाथ से जिनको बचना था | और जन्म लेते ही जो कृष्ण उपदेश दे रहे हैं मानव समाज को, शायद आप लोगों ने भी देखा होगा की कंस के कारागार से जब वासुदेव जी उन्हें टोकरी में लेकर जा रहे हैं,उस चित्र को देखें, की जन्म लेने वाले नवजात मानव मात्र को क्या उपदेश दे रहे हैं | अपने ही पाँव का अंगूठा मुह में लगा कर चूस रहे हैं | वही चित्र मै आप लोगों को दिखा रहा हूँ गौर से देखेंगे उनका उपदेश यह है की यह शरीर हमारा ही है | पाँव शुद्र है –मुंह ब्राह्मण-इसमें न कोई बड़ा है न कोई छोटा, हाथ क्षत्रीय है और पेट वैश्य है किन्तु यह सारा अपना ही है | मानव समाज में यह बड़ा छोटा का, ऊँच, नीच का भाव मिटाना हो तो वह मात्र श्रीकृष्ण जी के जीवन से ही हम ले सकते है, जो उन्होंने जन्म लेते ही मानव समाज को दिया | किन्तु हम जन्माष्टमी मनाने वालों ने उसे नही जाना और समाज में ऊँच, नीच का भेद बताकर मानव समाज को विभाजित किया | उसमें से किसी ने हाथी को सामने ला खड़ा किया तो किसी ने मनमानी अपना ही मूर्ति लगा लिया और दलित बता दिया किसी ने और किसीने अपने को हरिजन कह दिया | जन्म लेने वाले कृष्ण ने मानव मात्र को बताया यह शरीर अपना है इसमें चार भाग है, चार वर्ण है, ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शुद्र यह चारों मिलकर ही शरीर है |
यह चार वर्ण है जाती नहीं गुण कर्म स्वभाव के ऊपर ही उन वर्णों की व्यवस्था होती है | किन्तु जन्माष्टमी मनाने वालो ने उनसे यह शिक्षा नहीं ली | योगेश्वर कृष्ण ने बचपन से ही दूराचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ते रहे, चाहे वह पूतना को मारा हो दुष्ट दमन में बचपन से ही जिन्होंने अपने को समर्पित किया उनके जीवन में किसी प्रकार की कलुषित भाव आवे यह संभव ही नहीं | जिन्होंने न अपना देखा न पराया किन्तु मात्र धर्म और अधर्म,सत्य और असत्य की लड़ाई में जिन्होंने अपने सगे मामा को वध करने में भी संकोच नहीं किया | यह नहीं की वो राज सत्ता की लोभ से इस काम को किया हो, कारण अगर राज्य को प्राप्त करने के लिए लड़ते तो अपने नाना जी को उस राज गद्दी पर न बिठाते | इससे ये स्पष्ट हो गया की उनके सामने कोई लोभ और लालच की बात नहीं थी मात्र धर्म और अधर्म,सत्य और असत्य को लेकर पाप क्या है पुण्य क्या है उसे बताने के लिए योगेश्वर कृष्ण ने संघर्ष किया |
इन्ही बातो को कौरव और पांडव की लड़ाई से मिला कर भी हम देख सकते है यहाँ तक की योगेश्वर कृष्ण कौरवो को कई बार समझाने का प्रयास किया धर्म क्या है उसे भी समझाया नासमझ लोगो की तरफ से जवाब मिला धर्म क्या है हम जानते है, उसपर आचरण की व्रृति नहीं | योगेश्वर कृष्ण ने मात्र पांच गाँव देने की बात की तो जवाब मिला सुई की नोक के बराबर भी जमीन मिलना नहीं है यह सुनते ही योगश्वर कृष्ण ने अपने हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए और अर्जुन से कहा की युद्ध करने के लिए तैयार हो जाओ ये युद्ध धर्म युद्ध है, सत्य और असत्य की लड़ाई है, अर्जुन ने हताश हो कर कहा प्रभु किससे युद्ध करूं यह तो सारे अपने है | जवाब में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा की भाई यह धर्म को जानते है, किन्तु उसपे चलना नहीं चाहते अर्थात यह पापी है, दण्ड के भागी है, इससे हमे चूकना नहीं चाहिए | अर्जुन ने कहा इनके मर जाने से हमे पाप लगेगा जवाब में योगेश्वर कृष्ण ने समझाया दुष्टों को दण्ड देना धर्म है, अधर्म करने वालो को दण्ड देना धर्म है,धर्म विरुद्ध आचरण करने वालो को दण्ड देना धर्म है, धर्म को जानकर जो उस पर आचरण न कर उसे दण्ड देना ही धर्म है, धर्म का जय और अधर्म का नाश ही अवश्यंभावी है |
जिस योगेश्वर कृष्ण का जीवन मात्र धर्म के लिए अन्याय और अत्याचार के विरोध में अपनों से भी संघर्ष करते रहे हों ऐसे कृष्ण को लीला करने की फुर्सत कहाँ थी ? जन्माष्टमी मनाने वालो से विनम्र निवेदन है ऐसे महापुरुषों को किसी भी प्रकार बदनाम करने से हमे बचना चाहिए उनके जीवन से गुणों को धारण कर अपना जीवन भी उनके अनुसार बनाना चाहिए यह उद्देश्य है जन्माष्टमी मनाने का | योगेश्वर कृष्ण के जो दो चरित्र को मै आप लोगो के सामने दर्शया हूँ वो दोनों चित्र भी प्रस्तुत है मेरे लेख के साथ कृपया आप उन चित्र को देखकर,उनके चरित्र को अपने जीवन में उतारे | नोट :- यह ज़रूर ध्यान में रखना है के जन्म लेने वाले कभी अजन्मा नहीं हो सकते, और अजन्मा सिर्फ, परमात्मा ले लिए ही प्रयोग हुवा है,जीवात्मा ही जन्म लेते हैं परमात्मा नही | कारण जो जन्मे गा वह मरेगे, परमात्मा अजन्मा होने के कारण हो वह अमर है,इतना जरुर ध्यान रखना |
महेन्द्र पाल आर्य=वैदिक प्रवक्ता=दिल्ली == 19/ 8/ 22 ===

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