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जो आर्य हैं सत्य प्रिय हैं वह तो मेरे समर्थक होंगे ही ||

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जो आर्य हैं सत्य प्रिय हैं वह तो मेरे समर्थक होंगे ही ||
ऋषि दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना इसलिए भी की, उन्हों ने भारत में घूम कर लोगों के आचरण को किये गए कर्म को नजदीक से देखा | भारत के कई प्रान्तों का दौरा करते करते जब उन्होंने 1872 बंगाल को याद किया इसके बहुत से कारण थे कभी लिखूंगा, बंगाल के लोग विशेष कर कोलकाता शहर में लोग राम कृष्ण परमहंस को लेकर ज्यादा उतावला हो रहे थे |
लोग उन्हें एक संत और परमात्मा का साक्षात करने वाले साधक मानकर उन्हें लेकर लोग व्यस्त हो उठे थे | इसमें नरेन्द्र जी भी एक थे जो बाद में स्वामी विवेकानन्द बने |
बंगाल के लोग भली प्रकार से ईश्वर के विषय में चिंतन नहीं कर पा रहे थे | एक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को छोड़ सत्य से लोग कोसो दूर होते गये |
इसी काल में ऋषि दयानंद जी का आगमन बंगाल में हुआ, ऋषि दयानंद जी ने डंके की चोट कहा की ऐ मेरे भोले भाईयों ईश्वर देखने का और मानने का विषय नहीं है, ईश्वर तो जानने का विषय है | ईश्वर के गुणों को जानना चाहिए हम किसी को भी अपना ईश्वर मान नहीं सकते और न कह सकते हैं, यह मानवता पर कुठाराघात है |
हमें धन्यवाद देना चाहिए परमात्मा को, की हम किसी और योनियों में नहीं है, मानव हैं और एक मानव को छोड़ कोई और नहीं की परमात्मा को जान सके और उसकी प्रशंसा कर सके उसको पहचान सके |
इस सत्यता को बंगाल वासी अपने गले के नीचे नहीं उतार सके और सहज में ईश्वर को पाने का साधन तलाशा जो की मानवता विरोधी है |
इस समय अगर ऋषि दयानन्द जी का कोई समर्थन करने वाले बंगाल में थे तो वह मनीषी ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी ही थे |
पण्डितों ने ऋषि दयानंद जी के खिलाफ जुलुस भी निकाला उसमें विद्यासागर जी ने भाग नहीं लिया | और ऋषि का समर्थन करते हुए कहा उन्हों ने जो कहा बिलकुल सत्य कहा |
इसी सत्यता को जनमानस तक पहुँचाने के लिए ऋषि ने 1875 में आ कर एक संस्था को कायम किया जिसे हम आर्य समाज के नाम से जान ते हैं | यह संस्था केवल और केवल सत्य को उजागर करने के लिए ही बनाई गई | और इसी सत्यता के बल पे आर्य जगत के विद्वानों ने अपनी प्राणों की बाजी लगा दी |
यही वह आर्यसमाज नामी संस्था है जिसे उजागर करने के लिए मुंशीराम से महात्मा मुंशी राम और फिर स्वामी श्रद्धानंद बने जिन्हों ने गुरुकुल कांगड़ी बनाई और गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ भी, जिस का मैं विद्यार्थी रहा हूँ |
जिन्होंने अपना मकान बेच कर गुरुकुल को दिया | आज उसी गुरुकुल की जमींन बेच कर भी आर्य समाजी बता रहे हैं लोग अपने को, एक ही प्रमाण लिखा हजारों प्रमाण मौजूद है |
जिस सत्य के बेस पर यह संस्था बनीं आज 39 वर्षों से देख रहा हूँ की संस्था तो सत्य के आधार पर बनीं पर इसके सञ्चालन कर्ता अब असत्य के ही पक्षधर हैं एक से बढ़ कर एक झूठे मिथायावादी पदलोलुपता और ईर्षा द्वेष दलगत राजनीती करने वालों की यह संस्था बन गई है |
ऋषि दयानंद जी ने जो तौर तरीका दिया हैं, अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश और संस्कार विधि जैसी पुस्तक लिख कर लोगों को उसपर आचरण करने को बताया आज स्वामी जगदीश्वरानन्द जैसे सन्यासी हो कर उस काल जयी ग्रन्थ में मिलावट किया |
आज आर्य जगत में जितने भी सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित है सबमें मिलावट है | इसी सत्यार्थ प्रकाश की दूसरा संस्करण को लेने के लिए हम ऋषि सिद्धांत रक्षणी सभा के अधिकारीयों को तीन दिन अनशन करने के बाद मिला था परोपकारी सभा से |
रोहतक वाले रतिराम आर्य जी ने सत्यार्थ प्रकाश का भंडाफोड़ पुस्तक लिख कर बताया कहाँ कहाँ मिलावट हुआ और किन किन लोगों के द्वारा हुआ यह भाई अशोक आर्य उदय पुर वाले ने लिखा, कब तक चुप रहें ?
यह सब आँखों देखा हाल मैं लिख रहा हूँ मुझे कई जन्म लग जायेंगे सारा लिखने में जो असत्य वादियों ने ऋषि दयानंद जी के सपनों में पानी फेर रहे हैं |
कमाल की बात यह है की यह सारा काम ऋषि दयानंद जी के छाती पर बैठ कर कर रहे हैं इन्हें कोई रोकने वाला नहीं और न कोई टोकने वाला | आज बहुत नहीं लिखूंगा जितना सत्यता का प्रचार ऋषि ने किया लोगों के दिए गए जहर पी कर |
आज उसी संस्था में बैठे लोग और आर्य समाज के विद्वान् सत्य को तिलांजली देकर असत्य को अमृत मान लिया और उसे पीने मे मग्न हैं |
16 संस्कारों में यज्ञ में आहुति के लिए त्रियाम्वाकम वाला मन्त्र कहीं भी नहीं लिखा |
किन्तु आज इसे नहीं बोला जाये तो इनका यज्ञ पूरा ही नहीं होता जो ऋषि दयानंद की मान्यता नहीं है |
इस सत्यता को मैं बोलूं तो समाज में विरोध करने लगते हैं | यह है आर्य समाज की दशा कौन संभाले इसे और कहे भी कौन ? एक महेन्द्रपाल को छोड़ कई कहता ही नहीं |
स्वामी अग्निवेश ने सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिवंध लगाने के लिए दो मुसलमान को साथ लेकर दिल्ली के 30 हजारी में केस डाला | जिस केस को सत्यता से जोड़ने के लिए एक वकील विमल वधावन और मेरे सिवा कोई आर्य समाजी ही नहीं था | अग्निवेश ने केस कराया था इसका सारा प्रमाण वैदिक सार्वदेशिक पत्रिका में मौजूद है सारा प्रमाण मैं कई बार लोगों तक पहुंचाया | आज यहीं तक फिर आगे कभी लिखेंगे सत्य को धारण और असत्य को त्याग दो आर्य कहलाने वालों |
महेंद्र पाल आर्य -3 अगस्त 2022

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