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जो वस्तु जैसा है उसे ठीक वैसा ही जानना कहना, और मानना ही धर्म है |

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जो वस्तु जैसा है –उसे ठीक वैसा जानना, मानना, कहना ही धर्म है

मै आप लोगों के प्रायः विचारों को देखा हूँ , सबने अपनी मनमानी बाते की हैं, जो सत्य से कोसो दूर हैं उसमे भी कोई पुलिस की धमकी दी है किसीने, और किसी ने सिधु सभ्यता की बाते की है, और किसीने आर्य समाज को अपना दुश्मन लिखा है |

 

मेरा जवाब सबको है पुलिस किसी के व्यक्तिगत नहीं होते, पुलिस सत्य के लिए काम करती है | कौवा कान लेगया वाली बातों को पुलिस नहीं मानेगी | पहली बात, दूसरी बात पुरातत्व विभाग की इन्हें आधा तत्व का पता नहीं पूरा तत्व क्या जानेंगे ?

 

इन को पता नही जो यह मानते हैं, वैदिक काल से पहले, सिधु सभ्यता थी ? उसे सृष्टि विज्ञान का- क- ख –का ज्ञान नहीं है ? सृष्टि कहाँ हुई कैसे हुई मनुष्य की उत्पत्ति कैसी हुई, वह काल कौन सा था ? उसकाल का नाम क्या था ? इस से यह लोग कोसों दूर हैं |

 

मानव किसे कहते हैं इसकी जानकारी इनसब को नही है | शास्त्र का कहना है मानव वह है –मत्वाकर्मणिसिव्ते  अर्थात मानव वह हैं जो विचारशील, मननशील, बुद्धिमान –अकलसे काम ले वह मानव कहलाता है | अब देखें यह जितने भी मजहब वाले हैं –हिन्दू –मुस्लिम –सिख –ईसाई –जैनी –बौधी – यह सब जानने को मना करते हैं सिर्फ मानने को कहते हैं | क्या बिना जाने मानने का काम मानव का है ? शास्त्र कहता है नही –

 

यस्तर्केंनानुस्न्धात्ते स: धर्मे वेद नेतारा | अर्थात तर्कके कसौटी पर जो खरा उतरे उसे मानना ही धर्म है, अथवा जान कर मानना ही धर्म है |

 

अब देखें यह तर्कके कसौटी में न हिन्दू आ सकते, न मुसलमान –कोई मजहब वाला नहीं आसकता, कारण सबने कहा जानना नही –किन्तु मानना है, यही कहा= जैसा मात्र एक ही प्रमाण दे रहा हूँ , की इसलाम की मान्यता है मुहम्मद साहब ने अपनी ऊँगली के ईशारे से चाँद को दो दुकड़ा किया | अब कोई मुसलमान इसको नही पूछ सकता –की ईश्वराधीन चाँद को किसी व्यक्ति ने ऊँगली के इशारे से दुकड़ा कैसा कर सकता है ? यहाँ पूछने से मुसलमान नही बन सकता –मानने से ही कोई मुस्लमान बना |

 

ठीक इसी प्रकार हिन्दू कहता है, बालसमय रविभक्ष लियो – तीनो लोक होयोअंधियारों = अब इन बेचारे को पता नही की पृथ्वी से साढ़े 13 लाख गुणा बड़ा है सूरज | उसे कोई अपने मुह के अन्दर रखे क्या कोई विचारशील मानव कहलाने वालों का मानना उचित होगा ?

यहाँ भी आप पूछ नही सकते मानने का नाम ही हिन्दू है | ईसाईयों में भी यही है, अनेक प्रमाण है, अब बताना की मानव कौन है ?

 

आर्य समाज इन के दुश्मन हैं, किन्तु यह सब मत वाले, मानवता के नहीं ईश्वर के भी दुश्मन हैं | यह परमात्मा को जानते तक नही, यह कह रहे हमारी आस्था है, धर्म में आस्था की कोई जगह नही,यह जानते ही नही |

 

कारण धर्म वही है जो तीनो काल में एक हो- जो वस्तु जैसा है ,उसे ठीक वैसा जानना, मानना, कहना ही धर्म है | किसे के कहने और मानने में कोई परिवर्तन नही हो सकता |

 

जैसा कोई कहें मानो तो देव न मानो तो पत्थर =अब पत्थर को किसी के देव मानने पर देव का बनना संभव नही, कारण परमात्मा पर दोष लगेगा | जैसा किसी ने अपने हाथ में रेत की मुठठी भरली =और कहा –मानो तो चीनी, न मानो तो रेत | अब मै पूछता हूँ अकलमन्द कहलाने वालों से की क्या रेत को कोई चीनी बनाकर दिखा सकता है? जो वस्तु जैसा है वह तीनी काल में उसे वैसा ही रहना है | राम के काल में गूढ़ मीठा था , आज भी मीठा ही है , और आगे भी उसे मीठा ही रहना है | कोई कहें की गूढ़ मिटटी जैसी लगता है, उसने अपना मीठा पण को छोड़ दिया , यह कभी भी संभव नही | कारण गूढ़ का धर्म है मीठा लगना, गूढ़ अपने धर्म को कभी नहीं छोड़ सकती | आग्नि का धर्म है जलाना , जो राम के काल में जलाती थी,आज भी जलाती है , आगे भी जलती रहेगी | अगर वह अपना जलाने का काम छोड़ दे , कभी नही, हो सकता  यह है धर्म |

 

दूसरी बात जब इन्होंने मूर्ति में प्राण डाल दिया, फिर यह अपने हाथ से उसको किस लिए खिलाते ? उन्हें अपने आप ही खाना चाहिए था मूर्ति को ? क्या वह बच्चा है अथवा, अपाहिज, यही दोनों जो अपने हाथों से नहीं खा सकते ? अगर यह पंडित जिसने उस मूर्ति में प्राण डाला, जब उसीके हाथ से मूर्ति नही खाई, तो भक्तों के हाथ से ही कैसे खाए भला ?

अगला सवाल यह होना था की जब मन्त्रों से प्राण मूर्ति में आ गयी, तो उस पंडित के घर जब कोई मर गया उसके प्राण क्यों नही डाला, इस से बड़ा धोखा और क्या है ? अगला सवाल है की परमात्मा को यही लोग कहते –त्वामिव माता, च पिता त्वामिव | जब परमात्मा ही माता पिता,है तो राम को परमात्मा मानना कैसा उचित है ? क्या राम सबके पिता थे ? दशरथ के,कौशल्या के,लक्ष्मण के,सीताके वह पिताथे? फिर अगला सवाल हैं, के राम शब्द के रूप चलेंगे,

 

राम: रामौ रामा: –रामम् रामौ रामारन् –रामेण रामाभ्याम् रामै: -रामाय रामाभ्याम् रामेभ्य: रामात् रामाभ्याम रामेभ्य: -रामस्य रामयो: रामाणाम् –रामे रामयो: रामेषु –हे राम हे रामौ हे रामा: | यहाँ परमात्मा को बहुवचन में कैसे ले सकेंगे ? वह तो एक ही है अनेक नहीं वेद प्रमाण है |

 

यह मान्यता दयानन्द की नही है यह इनकी अपनी मान्यता है | किन्तु यह समय बहुत ठीक है की सार्वदेशिक सभा की और से सभी मजहब वालों को चुनौती देनी चाहिए की धर्म और मजहब में भेद क्या है उसपर खुल कर डिबेट करें -और सत्य को मानें असत्य को छोड़ें यह होना चाहिए |

 

मै तो यही कहूँगा शाबाश दुनियामे तरक्की उसे कहते हैं , न तराशे तो पत्थर थे , जब तराशे तो खुदा निकले |

पूत प्रस्तियों का शान निराला देखा , बनाया खुद , मगर नाम खुदा रख्खा |

महेन्द्र पाल आर्य 15 /12 /20 =

 

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