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तथा कथित आर्य समाजी बनाम रट्टू तोता ||

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तथाकथित आर्य समाजी बनाम रट्टू तोता

रट्टू तोता वाला प्रवाद बहुत पुराना है, एक व्यक्ति तोता को खूब रटाया था शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, पर तुम लोभ से फसना मत।
सभी तोते मिलकर यह रट लगाते रहे, पर तोते तो पक्षी हैं, मानव जैसी बात तो है नही? एक दिन शिकारी आया, जाल बिछाया, और दाना भी डाल दिया, अब तोते सब दाने देख कर अपनी रसना को मार नहीं पाये, और सब के सब उन दानों को चुगने में त्वरित गति से भाग कर उदर पूर्ति में एक दूसरे को मात देने लगे शिकारी तो जाल बिछा कर ही दाना डाला था, एक, एक कर सभी तोते जाल में ही फंस गये। कारण तोता तो कोई मानव नहीं? कि साधारण ज्ञान तथा नैमित्तिक ज्ञान दोनों हो? फिर मानव में और पशु में अन्तर क्या रह जायेगा? अतः मानव और पशु में क्या भेद है, इसकी व्याख्या आर्य समाज के प्रवर्तक ऋषि दयानन्द ने आर्य समाजियों को तोते जैसा ही रटाया था |
आर्य समाज के संस्थापक देव दयानन्द ने अपनी अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में मानवता का पाठ पढ़ाते हुये, समग्र आर्य जनों को जन्म से ले कर मृत्यु पर्यन्त क्या करना चाहिये, और क्या नहीं करना चाहिये, कब करना चाहिये, और कब नहीं। खाने पीने, उठने बैठने, पढ़ने लिखने से लेकर मानव जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जिस पर स्वामी जी ने प्रकाश में न डाला हो।
विशेष कर ऋषि दयानन्द ने मानव मात्र को वेदों के साथ जोड़ना चाहा और वेदों को ही आधार मानकर सबको वेदोक्त धर्म को जीवन में उतारने का उपदेश दिया, तथा वेदों से ही ईश्वर का पाना सम्भव है बताया, अन्यत्र किसी भी ग्रन्थ से परमात्मा का पाना सम्भव नहीं कहा, तथा प्रमाण दिये। ऋषि दयानन्द ने मानव मात्र को ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का भी उपदेश दिया, यहाँ तक कि आर्य समाज के दस नियमों में पाँच बार सत्य का ही उच्चारण किया और पहले नियम में सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेश्वर है लिखा।
परमात्मा को पदार्थ विद्या का आदि मूल माना है, ऋषि ने यह मानकर आर्य समाज के दूसरे नियम में उस परमेश्वर के नामों का परिचय दिया।
ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टीकृता है।
उस परमात्मा के साथ अपना नाता कभी न तोड़ने का उपदेश दिया, मात्र परमात्मा सेअपना नाता बनाये रखने को कहा। जिससे प्रत्येक आर्य जन हर बुराई से बच सके, क्योंकी परमात्मा के साथ जिसका अटूट सम्बन्ध बनता है, वह चोरी चुगली झूठ तथा अन्याय, अनाचार, अत्याचार, अविचारों से बचता रहता है, ईर्ष्या, द्वेष, घमण्ड आदि दुर्गुणों से भी ऊपर उठता है, सभी प्रकार की ऐष्णाओं से भी अपने को मुक्त रखने का प्रयास करता है।
क्योंकि उसके मन में सदासर्वदा परमात्मा का भय रहता है, कि कोई देखे या न देखे परमात्मा देख रहा है, यहाँ जो भावना है या धारण है, उसे कूट-कूट कर ऋषि दयानन्द ने आर्य जनों को तोते जैसा रटाया है।
वेद से सभी प्रमाणों को इक्ट्ठा कर आर्य जनों के सामने प्रस्तुत किया है, तथा ईश्वर पर अटूट श्रद्धा रखने का उपदेश दिया, तथा अनेक बार विष पान कर भी स्वयं को तैयार किया। यहाँ तक कि मृत्यु शैय्या में पड़े ईश्वर आस्था व ईश्वर विश्वास को देखकर गुरुदत्त विद्यार्थी जैसे ईश्वर की सत्ता को झुठलाने वाले भी आस्थावान हो गये, जो एक ऐतिहासिक प्रमाण है।
तीसरा नियम में वेद सब सत्य विद्या का पुस्तक है, जिसे पढ़ाना-पढ़ना व सुनना-सुनाना आर्यों का परम धर्म लिखा, और वेद ही सब सत्य विद्याओं का पुस्तक क्यों ? वेद से ही सभी प्रमाण देकर ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पुस्तक लिखकर आर्यजनों को दिया ताकि उन्हें परिश्रम न करना पड़े, अपने ऊपर सभी मुसीबतों को लिया, जैसे किसी नरेश का तलवार चलाना, कहीं ईंट व पत्थर से लहु लुहान होना, किसी का पान में विष देना, और दयानन्द को बलि चढ़ाने तक की मुसीबतों को अपने ऊपर लिया, ताकि आर्य जनों को किसी भी परेशानी का सामना करना न पड़े। अर्थात् ऋषि दयानन्द ने मात्र आर्य जनों को सही और सच्चा रास्ता बताने के लिए जिन विपत्तियों का सामना किया, मात्र उसे लिखा जाय तो एक मोटी पुस्तक बन जायगी ।
यहाँ तक कि ऋषि दयानन्द उस अंग्रेजी काल में डंके की चोट से कुरान तथा बाईबिल पर टिपण्णी की, और अनेक पादरियों को शास्त्रार्थ में परास्त किया, फिर उन्हें मात देकर वैदिक धर्मी बनाया था। यह परम्परा उस दयानन्द काल से लेकर अब तक चली आ रही थी जो 1983 से मैं आर्य समाज में आ कर देखा स्व.अमर स्वामी जी को, स्व.ओमप्रकाश खतौली को, स्व.पं.शान्ति प्रकाश जी को, स्व.आचार्य विश्वबन्धु जी को, कितने विद्वानों का नाम लिखूं बहुत बड़ी कतार है विद्वानों की, वेद के एकेश्वरवाद से कुरान छोड़ अनेक कुरान बेत्ताओं ने सत्य सनातन वैदिक धर्म को स्वीकारा है, जिसका एक अंग में भी हूँ।
मेरे पास इन 40 वर्षों का अनेक प्रमाण है जो इस्लाम जगत् के विद्वानों के पास ऋषि दयानन्द के सत्यार्थ प्रकाश में किये गये प्रश्नों का कोई जवाब ही नहीं है, प्रमाण के लिए कुरान में अल्लाह ने कहा- व मकारू व मकाराल्लाहो वल्ला हूं खैरल माकेरीन- सुरा-इमरान आयत 54 तथा सुरा अनफाल, आयत 30 अर्थ मकर करते है वह लोग, मैं भी मकर करता हूँ और मैं अच्छा मकर करता हूँ, अब देखें मकर माने धोखा- जिसे मक्कार कहा जाता,अब अल्लाह भी मानव के साथ धोखा करता है, क्या यह ईश्वर का काम हो सकता है? यहीं कारण है कि ईश्वर तथा अल्लाह में भेद है, जिसका प्रमाण दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में वेद और कुरान की तुलना की है।
ठीक उसी प्रकार वेद व बाईबिल को सामने रखा तथा सत्यार्थ प्रकाश के अन्तिम चार समुल्लास में प्रमाण दिया है। इस सत्यार्थ प्रकाश के जवाब में मौलवी सना उल्ला ने हक प्रकाश लिखा, जिसका जवाब पं.चमूपति जी ने चौदहवीं का चांद लिखा, आज तक इस्लाम जगत् के विद्वानों से जवाब नहीं मिल पाया, जानकारी के लिए, मैं बताता हूँ यह पुस्तक चौदहवीं का चाँद out of print हो गया था, 1989 में स्व.प्रो. उत्तमचन्द्र जी शरर ने मुझे पढ़ने को दिया, उसे पढ़कर मैंने सार्वदेशिक सभा प्रधान स्व. स्वामी आनन्दबोध जी को कहा आप आनन्द सुमन,अमरेश आदि की पुस्तक छापते हैं, जो गंगा प्रसाद और चमू पति की नकल किया उसे छाप रहे हैं, जबकी खजाना आपके पास मौजूद है।
अर्थात वह किताब मैंने उनको दिया। मैं सार्वदेशिक का प्रचारक था स्वामी जी ने मेरी बात मानली और पं.शिवराज जी से उर्दू व हिन्दी दोनों में ही सार्वदेशिक प्रकाशन से प्रकाशित किया गया, मुझे भी 25 किताबे दी गई।
और एक जानकारी आप लोगों को दे रहा हूँ मेरा कार्य कम था आजमगढ़ आर्य समाज श्री अक्षयवर मुनी जी के समाज में कई मौलाना मुझे सुनने को आते रहे, उसमें मौलाना मंजूर अहमद थे मेरे से प्रभावित होकर मिलने को आये, काफी वार्ता के बाद मैने उनको ‘चौदहवीं का चाँद’ पुस्तक भेट किया। दो महिने के बाद उनका पत्र आया, आप ने मेरी आँखे खोल दी, मैं अपना नाम ज्ञान प्रकाश रख लिया है आप हक के लिये दुआ कीजिये |
पुनः 20 दिन के बाद मेरा कार्यक्रम फैजाबाद के गोंसाई गंज में था मैने उसे वहाँ बुलाया, तीन दिन हम लोगों के साथ रहा, उसने कहा मैं संस्कृत पढ़ना चाहता हूँ उस कार्यक्रम में आचार्य वसुमित्र शास्त्री जी अयोध्या गुरुकुल के कुलपति मौजूद थे, मैने उनसे प्रार्थना की। आचार्य जी मौलाना ज्ञान प्रकाश को अपने साथ ले गये, पर आर्य समाजियों को मैं क्या कहूँ? दो मास भी गुरुकुल में उसे रहने नहीं दिया, उसने मुझे लिखा। फिर मैं आचार्य चन्द्रदेव जी के पास फरुखाबाद गुरुकुल में भेजा और आज वह उच्च माध्यमिक विद्यालय में संस्कृत के मास्टर हैं।

मेरे पास उनके सारे पत्र मौजूद है, इस प्रकार कई कार्य मैंने किये। आर्य जनो याद रखना मैंने यह काम निष्काम भाव और बिना किसी लोभ लालच के किया न कि किसी गुरुकुल या समाज का अधिकारी बनने की ईच्छा लेकर।
अब मेरा प्रश्न होगा कि दयानन्द के काल से अब तक सत्यार्थ प्रकाश के चार सम्मुल्लासों में विभिन्न मत, मतान्तरों पर ऋषि द्वारा की गई समीक्षा का जवाब उन मत मतान्तरों के विद्वानों के पास नहीं है, जैसा कुरान सुरा कहाफ, आयात 86 में अल्लाह ने सूरज को कीचड़ वाला तालाव में डूबता है बताया है, यह क्यों और कैसे क्या कोई बुद्धि परख आदमी इस को मान लेंगें? ठीक इसी प्रकार बुद्धि विरुद्ध बातें को ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश केअन्तिम चार समुल्लासों में दर्शाया है। और बात जिन मत मतान्तर वालों की है उनलोगों के पास इसका कोई जवाब ही नहीं है। और न कयामत तक जवाब दे सकते हैं।

पर आज क्या कारण बना कि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उस ऋषि कृत सत्यार्थ प्रकाश में परिवर्तन लाने की बात की जा रही है? वह भी एक सिद्धान्त विहीन वैदिक मर्यादा के अनभिज्ञों के द्वारा? कुछ दयानन्द के हत्यारे भी दयानन्द द्वारा दिये गये वैदिक मर्यादा की हत्या करने में तुले हुये हैं। खुशहाल चन्द जैसे एक व्यापारी ने भी वैदिक सार्वदेशिक में इसका समर्थन किया यही अग्निवेश के खिलाफ खुशहाल चन्द जी ने अपना एक लेख ऋषि सिद्धान्त रक्षक में मुझे छापने को भेजा था, जो मेरे फाईल में आज भी लगे हैं।

मैं बताना चाहूँगा ऋषि दयानन्द ने तो तोते जैसा आर्य जनों को रटाया था परमात्मा से डरना, परमात्मा सर्वव्यापक है, कोई न देखे परमात्मा देख रहा है। निष्काम भाव से काम करों संध्या उपासना ध्यान परमात्मा का सदा करते रहना। यज्ञादि परोपकार से अपना नहीं अपितु प्राणी मात्र का कल्याण करना जिससे तुम लोग देवत्व को प्राप्त करो व मोक्ष के भागी बनो आदि।

जैसे तोते को रटाया गया था और फिर वही तोता जाल में फस गया, ठीक आज आर्य समाजी कहलाने वाले भी वही रट्टू तोते जैसे अपनों को सिद्ध करने में लगे है। दरअसल बात यह है कि गलत आदमी जहाँ कहीं भी होंगे वह तो अपना काम करेंगे उनको वैदिक सिद्धान्त से क्या लेना है। आज सिखों को सन्तुष्ट करने के लिए सत्यार्थ प्रकाश में दयानन्द की बातों को हटाना चाहते हैं,अग्निवेश, कल ईसाई व मुसलमानों को सन्तुष्ट करने के लिये, कुरान व बाइबिल की बातों को हटाने की बात करेंगे, हिन्दू विरोधी होने हेतु यह सत्यार्थ के 11 वां समुल्लास पर कुछ नहीं कहेंगे, जब कि बाबा तुलसी दास ने झूठ का सहारा लिया मात्र ईसाई व मुसलमानों को जैसा का तैसा जवाब देने के लिये। जैसा इस्लाम की मान्यता है पैगम्बरे इसलाम ने अंगुली से चाँद को टुकड़ा किया पौराणिकों ने जवाब दिया हनुमान जी सूरज को खा गये।
इस्लाम का मानना है कबर में सजा के लिये शजाये इकरा नाम के साँपको छोड़ दिया जायगा जो मुर्दा को डंसकर 70 गज जमीन के नीचे गाढ़ देगा, जिसका नाखुन 12 क्रोस का है, अब जबाव में कुम्भ करण का मूंछ 24 क्रोस का है कहा मात्र नेहला पर देहला चलाने को, वरना विशेष कर आज हिन्दुओं को मोमबत्ती जलाकर खोजना पड़ता अस्तु ।
फिर देखें कुरान, गुरुग्रन्थ, चारवाक्य, शंकर का अद्वैतवाद व बाईबिलादि पर ऋषि दयानन्द ने जो समीक्षा किया है, उस पर अंगुली उठाने की हिम्मत 1875 से ले कर अब तक किसी भी मत मतान्तरों की विद्वानों ने नहीं की, और न आर्य जगत में इतने बड़े-बड़े धुरन्धर विद्वान जन्में उन लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई, कि सत्यार्थ प्रकाश में ऋषि की बातों को परिवर्तन करना चाहिये? अचानक एक पाखन्डी सत्यानाशी अग्निवेश ने अपना उल्लू सीधा कर आर्यजनों के खिलाफ सिखों को भड़का कर सत्यार्थ प्रकाश में परिवर्तन करना चाह रहे हैं, क्या भगत सिंह के परिवार का कोई सत्यार्थ प्रकाश नामी ग्रन्थ को नहीं पढ़ा था? फिर उन परिवार वालों ने सत्यार्थ प्रकाश में गुरुग्रन्थ पर दयानन्द के विचारों को क्यों और कैसे स्वीकारा था?
सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध सिंध जैसे प्रान्तों में मुसलमानों के प्रयास करने पर भी नहीं लग पाया था, हैदराबाद निजाम का भी प्रयास विफल हो गया था। आज अग्निवेश रूपी नबाव अपने को आर्यसमाजी प्रचार कर भी सत्यार्थ प्रकाश में परिवर्तन चाह रहे हैं, जो काम उस समय नहीं हुआ वह आज करने की बात कर रहे हैं।
दर असल भ्रष्ट लोग जहाँ भी होंगे, वह अपना रंगदारी तो दिखायेंगे ही वरना कौन जानेगा उसे? कल 24 अगस्त 2006 को लोक सभा में सांसद साधुयादव कुर्सी लेकर दूसरे सांसद को मारने को दौड़े। यह उनके लिये आश्चर्य की बात नही क्योंकि कुछ दिन पहले उनके जीजा लालु प्रसाद यादव जी ने लोक सभा में महिला बिल को फाड़ा था, साधु जी ने मात्र मारने को दौड़े थे, दरअसल यह लोग नाम से साधु है वृत्ति में साधुता नहीं ऐसे विचार वाले जहाँ रहेंगे लोक सभा हो, राज्य सभा या घर परिवार में सब जगह उधम ही मचायेंगे। कारण जो छः हजार के वेतन योग्य नहीं अगर 36 हजार मिले तो वह पैसों की गर्मी को कहाँ दिखायेंगे भला?
यही हाल अग्निवेश का है नाम से सन्यासी हैं न त्याग है, और न ऐषणाओं से अलग हो पाए, आज वही अग्निवेश रूपी शिकारी समग्र आर्य समाज में जाल बिछाया दाना डाला, आज आर्य समाजी कहलाने वाले तोते व मैंना उस दाने को खाने के लिए जाल में फंसते जा रहे हैं।
कुछ लोग पहले से फंसे हैं कुछ लोग अभी फंस रहें हैं मैं किन का किन का नाम लिखूं ? ऋषि दयानन्द जिन-जिन कामों को मना किया उसे ही करने के लिए दयानन्द कृत ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में परिवर्तन करना चाहते हैं कि न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी वाली बात हो जाये।
महेन्द्र पाल आर्य 2006 में लिखा था आंखों देखा हाल ।

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