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|| देश चलाने वाले राजा वेदादि विद्या में पारंगत हो ||

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|| देश चलाने वाले राजा वेदादि विद्या में पारंगत हो ||
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः|
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः||
राजा वही पुरुष है जो अपने आप मे दण्ड है,वही न्याय का प्रचारकर्ता और सबका शासन कर्ता वही चार वर्ण और आश्रमों के धर्म का प्रतिभूः अर्थात जामिन है | [सत्यार्थप्रकाश ६ ]
ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने सत्यार्थप्रकाश के छठे समुल्लास में मनु का हवाला देकर लिखा है | मनु जी महाराज ऋषियों से कहते हैं कि चारों वर्ण और चारोंआश्रमों के व्यवहार कथन के पश्चात् राज धर्मों को कहेंगे कि जिस प्रकार का रजा होना चाहिए और जैसे इसके होने का संभव तथा जैसे इस को परम सिद्धि प्राप्त होवे उसको सब प्रकार कहते हैं |
ऋषि ने ऋग्वेद का प्रमाण देकर लिखा है |
त्रीणि राजाना विदर्थे पुरूणि परि विश्वानि भुषथः संदासि | मं ३ सु० ३८ मं० ६
ईश्वर उपदेश करता है कि राजा और प्रजा के पुरुष मिलके सुख प्राप्ति और विज्ञान वृद्धि कारक राजा प्रजा के सम्बन्ध रूप व्यव्हार में तीन सभा अर्थात विद्यार्यसभा, ध्रामार्यसभा, राजर्यसभा, नियत करके बहुत प्रकार के समग्र प्रजा सम्वन्धी मनुष्यादी प्राणियों को सब और से विद्या, स्वातंत्र, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें |
राजा अगर धर्मात्मा नहीं है तो प्रजाओं की रक्षा नही हो सकती, यही कारण है राजस्य मुलम धर्म: बताया गया है | पर हमारे देश को ही धर्म निरपेक्ष बता कर, चारों तरफ नेताओं ने बताही मचा रखी है | कारण धर्म रोकता है रिश्वत से, अन्याय, अधर्म, किसी भी प्रकार मानवता विरुद्ध कार्य को करने से, इसके विपरीत आचरण करने से मना किया, और कहा कोई भी मानवता विरुद्ध कार्य नही होना चाहिए आदि |
राजा को इसीलिए धर्मात्मा होना ज़रूरी है, जो शुद्ध अशुद्ध को जानें नियम अनियम को जानें, न्याय, अन्याय को जाने, मानव मात्र के हित अहित को भी जाने, राष्ट्र के हित अहित का भी जानने वाला हो आदि |
अर्थात राजा को हर प्रकार के न्याय का जानने वाला होना चाहिए, तभी प्रजाओं के साथ समान व्यवहार करना संभव होगा | पर हमारे देश में कानून भी हर एक के लिए बराबर नही किसी के लिए कुछ और किसीके लिए कुछ |
जो सरासर देश के लिए घातक है, लोगों में हीनं भावना पैदा होगी | जैसा किसी को चार शादी, करने की छुट हो, और कोई दो शादी करे उसे आप सात साल की सजा सुनाएँ |
आश्चर्य की बात तो यह भी है की सात साल की सजा वह सुनाता है जो खुद चार पत्नी का पति है, और दो पत्नी वाले को सात साल का सजा सुनाता है | यह कहाँ का न्याय है, और कैसा न्याय है, अगर यही न्याय है तो अन्याय क्या है, और कौनसा है ? हमारे देश में यही व्यवस्था है |
हमारे देश में किसी को हज़ करने के लिए सरकार अनुदान देती है, और किसी को तीर्थ जाने पर टेक्स उसुलती है सरकार | यह कौनसी न्याय व्यवस्था है ? इसे न्याय कहना भी अन्याय है | इस के बाद भी उन्हें चैन नहीं जिन्हें जितनी सुविधा और आज़ादी मिली हुई है वह और भी सुविधा पाने के लिए सरकार पर हावी हैं |
इसी अन्याय पूर्ण तरीके से बचने के लिए ही राजा को धर्मात्मा होना अनिव्यार्य बताया है शास्त्र में | आयें हम मानव कहलाने वाले इसपर गम्भीरता से विचार करें और सत्य बोलना सीखें, औरों से बुलवाने का भी प्रयास करें |
ऋषि दयानन्द जी की मान्यता है, सत्य को बोलना, और बुलवाना, असत्य को छोड़ना और छुड़वाना ही मानवता है | आज तो लोग अपने आप ही सत्य नहीं बोलते औरों से तो बुलवाने की बात को कोई सोच भी क्या सकता है ?
साथ ही ऋषि बतलाते हैं असत्य को छोड़ना, और छुड़वाना, आज तो लोग असत्य को ही छोड़ना नहीं चाहते खुद, दूसरों से क्या छुड़वाएंगे ? आज तो मानवों का जीवन असत्य को ही सत्य कहने में विश्वास रखते हैं |
महेन्द्रपाल आर्य =वैदिकप्रवक्ता =दिल्ली =23 /2 /17 को लिखा था ||

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