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धर्म और मजहब में भेद क्या है यह जानना भी मानव का ही काम है |

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धर्म और मजहब में भेद क्या है यह जानना भी मानव का ही काम है |
अगर हम मानव कहलाना चाहेंगे तो हमें धर्म पर आचरण करना पड़ेगा, न कि मजहब पर। इसलिए भी धर्म और मजहब के भेद को जानना जरूरी हो गया मनुष्य मात्र को, जिसका सारा निचोड़ मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, यद्यपि प्रथम में मैं धर्म पर कुछ चर्चा कर आया हूँ फिर भी विस्तार से लिखूंगा कि धर्म क्या है? धर्म मानव के निर्मित होते हैं या परमात्मा के,धर्म सम्पूर्ण मानव जाति के लिए होता है अथवा किसी वर्ग या सम्प्रदाय केलिए होता है,पतिऔर पत्नी के लिए,या पिता पुत्र के लिए धर्म अलग होता है?
धर्म की परिभाषा क्या है जिसको दर्शा रहा हूँ, किसी व्यक्ति विशेष द्वारा बताई व चलाई गई पूजा पद्धतियों व वेशभूषा के आधार पर एक सम्प्रदाय विशेष की स्थापना कर ली गई और उसे ही धर्म का नाम दे दिया गया, जैसा इस्लाम, इसाई, सिख बौद्ध, जैन, बहाई, आदि और इसी को आधार मानते हुए लोग अपने लेखन व भाषणों में कहा करते हैं कि भारत वर्ष में अनेक धर्मों के लोग निवास करते हैं। वास्तव में यह धर्म नहीं सम्प्रदाय हैं,पन्थ हैं, किसी एक व्यक्ति विशेष को अपना अगवा मानकर उसके पीछे चलने वाले लोगों के समूह को सम्प्रदाय अथवा पंथ कहाजाता है |
मुहम्मद साहब के पीछे चलने वाले मुस्लमान कहलाते हैं, इस्लाम मतावलम्बी कहलाते हैं। ईसामसीह के मान्यतानुसार चलने वाले ईसाई कहलाते हैं, गुरु गोबिंदसिंह के पीछे चलने वाले सिख कहलाते हैं,महात्मा बुद्ध के अनुयायी को बौद्धी कहा जाता है,महावीर स्वामी को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। यह सभी मजहब हैं, सम्प्रदाय हैं,पंथ हैं, धर्म नहीं हैं। कारण धर्म तो मानव मात्र केलिए एक ही है,जोआदि से है और अंत तक रहेगा। जो अपरिवर्तनीय है, पहले से हैऔर अंत तक रहना है, शाश्वत है, अमर है ।
धर्म मनुष्य मात्र के लिए है, मनुष्य से धर्म नहीं है, धर्म किसीके साथ नहीं चलता किन्तु धर्म के साथ सब चलते हैं या सबको धर्म के साथ चलना चाहिए। कारण धर्म है ही मानव मात्र केलिए। जो मानव धर्म पर नहीं चलता वह मानव कहलाने के हकदार भी नहीं होंगे।
अब मानवों के लिए धर्म का अलग-अलग होना, कहना या फिर बोलना, यह धर्म का अपमान ही तो है। इसका प्रमाण यह है कि धर्म शब्द मूल रुपसे संस्कृत भाषा का है, संस्कृत भाषा के व्याकरण में धर्म शब्द के रूप नहीं होते, क्योंकि इस शब्द का बहुवचन होता ही नहीं और न तो बनाने की आवश्यकता। कारण यही कि धर्म अनेक होते ही नहीं। अतः धर्म एक ही है किन्तु कौन सा है क्या है? जिसकी स्थापना और धारण करने के लिए भारतीय ऋषियों ने सदैव निर्देशित किया है और जो समस्त मनुष्य समाज का जीवनआधार माना गया है। धर्म क्या है,इसको भली प्रकार समझें। धर्म शब्द ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना, धृयते धार्यते सेव्यते इति धर्मः अर्थात जो धारण व सेवन के योग्य हो और अपने अस्तित्व बनाये रखने हेतु जिसे धारण व सेवन किया व कराया जाये उसे धर्म कहते हैं। अब मजहबे इस्लाम को देखें…
अब आपसे मैं पूछता हूँ कि..ला इलाहा इल्लालाल्लाह मुहम्मदुर रसूल अल्लाह =कलमा =
नहीं है कोई उपासक अल्लाह को छोड़, मुहम्मद अल्लाह का रसूल है |
क्या इस कलमा को धरती पर मानव कहलाने वाले सभी पढ़ते हैं या सिर्फ मुस्लमान? मैं ऊपर बताया हूँ कि जिसका धारण करना व सेवन करना मानव के अस्तित्व बनाये रखने हेतु है वह धर्म है । पर आप बताएं कि मुस्लमान को छोड़ इस कलमा को कौन पढ़ता है? आप वेद को बिना जाने ही वेद पर प्रलाप करने लगे,पर यह तो आप लोगों की आदत है, जो मैं पहले से ही देखता आ रहा हूँ । इस्लाम धर्म कैसे हो सकता जब वह मानव मात्र केलिए है ही नहीं सिर्फ एक वर्ग विशेष केलिए हो, मानव समाज को दिक् भ्रमित करने के लिए हो, जिस कारण आपके मुहम्मद{स} को जलावतन होना पड़ गया था जो आपने कहा । जब आप परमात्मा के दिए या बनाये गये धर्म को तोड़ेंगे या लोगों को उस से अलग करेंगे तो लोग विरोध न करें यह कैसे हो सकता था? धर्म क्या है फिर देखें—
सीमानो नाऽतिक्रमणम् यत्त धर्मम्
अपनी सीमा, मर्यादा अर्थात कर्तव्य व अधिकारों का अतिक्रमण न करना ही धर्म का महत्वपूर्ण अंग व लक्षण है। अतः प्रत्येक धारण किया जाने वाला सदाचरण एवं सर्वकल्याणकारी व श्रेष्ठ विधान(नियम/कानून) अथवा सामाजिक व्यवस्था(अनुशासन) को भी धर्म ही कहा जाता है।
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधिं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।।
(मनुस्मृति अध्याय-१ श्लोक-१३१)
वेद के द्वारा दिये गये आदेशों,निर्देशों,आज्ञाओं व शिक्षाओं तथा उनका अनुकरण-अनुसरण करने वाले आप्त पुरुषों के गुण,कर्म,स्वभाव एवं उनके द्वारा रचित ग्रन्थों और अपनी आत्मा अर्थात् स्वयं को प्रिय लगने वाले सत्य भाषण आदि व्यवहार को एक संगठन के रूप में (एक साथ) जीवन में धारण करना (चरित्र में उतार लेना) ही साक्षात् धर्म व धार्मिक व्यक्ति का लक्षण है ।
अस्तु जो पक्षपात रहित न्याय,सत्य का ग्रहण व असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार(आचरण) है,उसी का नाम धर्म है और इसके विपरीत जो पक्षपात सहित अन्यायाचरण, सत्य का त्याग व असत्य का ग्रहण रूप कर्म का आचरण है उसी को “अधर्म” कहते है। (सत्यार्थ प्रकाश)
महर्षि व्यास जी भी कहते हैं..
श्रुतयां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैवाव धार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
अर्थात जो-जो गुण कर्म स्वभाव आचरण व व्यवहार आपको अपने लिए अच्छा नहीं लगता है,जिसे आप अपने साथ कराने को तैयार नहीं है, वैसा प्रतिकूल आचरण व्यवहार आपको भी दूसरों के साथ कदापि नहीं करना चाहिए,यही धर्म है । कासमी साहब! क्या कुरान इसमें खरा उतर रहा है या कुरान लोगों में बदले की भावना भर रहा है कि तुम भी उनको मारो जो तुम्हें मारे ?
क्या यही अल्लाह है और उसकी कलाम जो मानव समाज को मारो काटो की शिक्षा दे ? चलो यह मान लेते हैं कि जो मारा है उनको मारो जो आपकी मान्यता है,पर नमाज कायम करें यह किसलिए? इस्लाम स्वीकार करें किसलिए? तौबा करे काहे को ? उनके बाप दादा पहले से,जिसको धर्म जाना जो परमात्मा का बनाया हुआ धर्म उससे आप हटकर अपनी मनमानी बातों को मनवाना चाहते हो,तो क्या वह चुपचाप स्वीकार करेंगे? जो तर्क की कसौटी पर खरा न उतरे उसे धर्म किसलिए कहा व माना जाये? और खूबी कि बात है कि यह अल्लाह का कहना है,तो अल्लाह सम्पूर्ण मानव जाती का है कि सिर्फ मुसलमानों का है? अगर आप कहें कि मानव मात्र का है तो यह कोरा झूठ है, कारण सभी मानव कहलाने वाले नमाज नहीं पढ़ते, रोजा नहीं रखते। तो फिर अल्लाह पर पक्षपात का दोष लगा,यह दोष लगने पर वह परमात्मा नहीं हो सकते,यह काम अल्लाह का है,अल्लाह अवगुणों से घिरा है |
यह कैसा अल्लाह जो मानव को लड़ने की तालीम दे और वह दुष्टों से नहीं गैर मुस्लिमों से जो नमाज न पढ़ें, रोजा न रखें जबकि मानव बंटा है अच्छे और बुरों में,यह नमाज पढ़ाने वाले अल्लाह क्यों और कैसे? धरती पर रचना के वक्त अल्लाह ने तो नमाज को नहीं कहा या क्या उस वक्त अल्लाह भूल गये थे? अब मुहम्मद के काल में अल्लाह को नमाजी और बेनमाजी में मानव को बांटना पड़ गया? जो आये दिन नियम बदले वह परमात्मा नहीं हो सकते यह दोष लगने वाला काम है । धर्म बदले, धर्म पुस्तक बदल डाले, यह काम ईश्वर पर दोषारोपण करता है,यही कारण है धर्म किसे कहते हैं भली प्रकार जानना होगा।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
अर्थात समस्त प्राणीयों का हित करने और हित करने के विषय में चिन्तनशील रहने से संसार में महापुण्य होता है और इसके विपरीत प्राणियों को अकारण मन-वचन व कर्म से पीड़ा पहुँचा कर उनका अहित करना महापाप है । यही पुण्य पाप क्रमशः धर्म व अधर्म कहलाता है। मियां जी! धर्म किसे कहते हैं भली प्रकार जानने का प्रयास करें| किसी मजहब को धर्म कहना परमात्मा के बनाये नियमों का उल्लंघन करना है और परमात्मा का नियम आदि में ही धरती के सृजन के वक़्त ही बनता है जो बन गया वही पृथ्वी प्रलय तक ही रहना है । जिसमें बार बार उसके नियम बदलने से उसके ज्ञान में भट्टा लगेगा जो अल्लाह पर लग रहा है।
यस्तर्केण अनुसंधत्ते स धर्मः।
दर्शनशास्त्रमें बताया गया….
यतोऽभ्युदय निश्रेयस सिद्धः स धर्मः।
 
यानि जिसको निर्देश व आधार मानकर पुरुषार्थ करने से संसार के भौतिक सुख सुविधा वैभव व ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ,आत्मिक सुख शान्ति,मोक्ष प्राप्त हो उसको धर्म कहते हैं। भाई जी! अब आप ही बताएं,कि लड़ने से आत्मिक सुख मिलेगी क्या? हां भौतिक सुख मिल सकता है कारण लूट के माल हाथ लगेगा,जिसे आप माले गनीमत कहते हैं पर यह पाठ मानवता का नहीं, इसी का नाम दिमाग बेचना कहते हैं या फिर अकल बन्धक रखना कहते हैं|यह मैं आपकी किताब से ही दिखाता हूँ कि आप इस्लाम वालों ने अकल को किस प्रकार -गिरवी रखा है या अल्लाह के नाम से किस प्रकार अंधविश्वास को अपनाया है।शरियते कानून से आप लोगों ने इसी मजहबी जूनून को अपने दिमाग में बनाये रखा है देखें।
 
कानुने शरियत से जिन बातों को दर्शाया गया क्या यह सही है? काबिले कुबूल है ? यह दिमाग रखने वाला इन बातों को मान सकता है? या फिर दिमाग को गिरवी रखना होगा इस्लाम के पास? आपने फलसफा पढ़ी,मन्तिक भी जो डींग हांक रहे है,यह कौन सा तर्क शास्त्र है कि बुद्धिमान इन्सान इस बात को सच मान ले,कि अल्लाह ने तमाम जहाँन को बनाया हुजूर के नूर से या नूर की तजल्ली से ?
अम्बिया,फरिश्ते,जमीन,आसमान, अर्श, कुर्सी, जितने भी हैं तमाम जहान को हुजूर के नूर की झलक से बनायाऔर जितनी भी खूबियाँ, जितने भी कमाल हैं अल्लाह ने सभी हमारे हुजूर को दिया है,हमारे हुजूर कि बराबरी कोई नहीं कर सकता इससे बड़ा अंधविश्वास क्या है दुनिया में? यही है पढ़ने लिखने की नौबत, जिस विद्या के ऊपर इंसानियत टिकी है यही है, वह इल्म या आलिम कहलाने वाला,यही है वह मन्तिक । इस्लाम जिसको तर्कशास्त्र मान रहा,है इस्लाम में तर्क की कसौटी से परखने कि अनुमति है क्या ? असलम कासमी को जवाब दिया जिन्हों ने मुझ पर पुस्तक लिखी थी | महेंद्र पाल आर्य 6/अगस्त /22

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