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धर्म किसी व्यक्ति से नहीं होता ||

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धर्म किसी व्यक्ति से नहीं होता |
जब न कृष्ण है न वासुदेव, न तो राम थे न दशरथ इससे भी आगे देखें, जब अग्नि वायु, आदित्य, अंगिरा और न हीं कपिल, कणाद, गौतम, पतंजलि, व्यास, जैमनी, आदि कोई भी मध्य में नहीं थे उससे पहले धर्म था | आप परमात्मा को जानें और उसे पाने के लिए अपने आप प्रयास करें।
अष्टांगयोग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, यह रास्ता है ईश्वर के सान्निध्य पाने का, जो आप स्वयं करें इसे जानकर करना चाहिये।
पर मैं लिख रहा था मजहबी मान्यता को तो मजहब, किसी के द्वारा होने हेतु लोग उनपर अपना प्राण तक न्यौछावर कर देते हैं और जो दुनिया का बनाने वाला है वह गौण रह जाता है और उस मजहब के जन्म दाता को ही अहमियत दी जाती है। जो इस्लाम और ईसाईयत में जीताजागता प्रमाण देखने को मिलता है। पर ईसाईयत में इतना नहीं कि जितना इस्लाम में है, व्यक्ति-पूजा के सिवा और कुछ नहीं, है इस्लाम |
मैं उन्ही कि किताब से प्रमाण दे रहा हूँ, जो पहले बताया गया, कि इस्लाम की जो बुनियाद है, जिसमें प्रथम, कलमा बताया यह ईमान का प्रथम दायरा है। कोई भी इसको पढ़े जुबान से इकरार करे, और दिलसे स्वीकार करे ।
ला इलाहा ईललाल्लाह मुहम्मदुर रसूल अल्लाह ||
अर्थ- नहीं है कोई अल्लाह के सिवा इबादत के लायक, मुहम्मद स. अल्लाह के रसूल हैं । नोटः- यह जो कलमा है पूरी कुरान में यह अल्लाह और मुहम्मद दोनों नाम एक जगह नहीं है। यानि ला इलाहा ईल्लाल्लाह एक जगह है तो दूसरी जगह मुहम्मदुर रसूल अल्लाह यह शब्द आया है।
अगर यह दोनों वाक्य मिलाकर एक कलमा है? तो यह दोनों जुमला एक जगह क्यों नहीं? कलमा की बात अगर यह मान लें, जो यह मजहब है कि अल्लाह के नाम के साथ, मुहम्मद का नाम जुड़ा हुआ है। अगर मात्र कोई लाइलाहा इल्लाल्लाह कहते कहते उसके मुंह से झाग निकल कर वह मर भी गया, तो भी वह मुस्लमान नहीं बना। मुस्लमान कोई तभी बन सकता है जो कि मुहम्मदुर रसूल अल्लाह कहे। यह है मजहब..
अब देखिये धर्म क्या है-
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वो भुतान्त्रात्मा।
परमात्मा एक है, विश्व के रचयिता हैं। उसने सब जगह है सब में है इस विश्व को अपने काबू में किया हुआ है। धर्म का सम्बन्ध सीधा परमात्मा से है। किसी भी प्रकार बीच में कोई नहीं कि जिसके माध्यम से परमात्मा तक पहुंचना पड़े। कौन है वह परमात्मा? उसमें क्या गुण हैं और क्या नहीं? देखें यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 8-
स पर्यंगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो! जो ब्रह्म शुक्रम्= शीघ्रकारी सर्वशक्तिमान् अकायम्= स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित अव्रणम्= छिद्ररहित और नहीं छेद करने योग्य अस्नाविरम्= नाड़ी आदि के साथ सम्बन्ध रूप बन्धन से रहित शुद्धम्=अविद्यादि दोषों से रहित होने से सदा पवित्र और अपापविद्धम= जो पापयुक्त पापकारी और पाप में प्रीति करनेवाला कभी नहीं होता परिअगात्= सब ओर से व्याप्त है जो कवि:= सर्वत्र मनीषी=
सब जीवों के मनों की वृत्तियों को जानने वाला परिभू:= दुष्ट पापियों का तिरस्कार करनेवाला और स्वयम्भू:= और अनादिस्वरूप जिसके संयोग से उत्पत्ति वियोग से विनाश माता पिता गर्भवास जन्म वृद्धि और मरण नहीं होते वह परमात्मा शाश्वतीभ्यः= सनातन अनादिस्वरूप अपने-अपने स्वरूप से उत्पत्ति और विनाशरहित समाभ्य:= प्रजाओं के लिये यथातथ्यतः= यथार्थभाव से अर्थात्= वेद द्वारा सब पदार्थों को व्यदधात्=विशेषकर बनाता है यही परमेश्वर तुम सब लोगों के उपासना करने योग्य है |
भावार्थ:-हे मनुष्यों! जो अनन्त, शक्तियुक्त, अजन्मा, निरन्तर, सदामुक्त, न्यायकारी, निर्मल, सर्वज्ञ, सबका साक्षी नियन्ता, अनादिस्वरूप, ब्रह्म कल्प के आरम्भ में जीवों को अपने कहे वेदों से शब्द,अर्थ और उनके सम्बन्ध को जानने वाली विद्या का उपदेश न करे, तो कोई विद्वान् न होवे, और न धर्म अर्थ काम और मोक्ष के फलों के भोगने में समर्थ हो, इसलिये इसी ब्रह्म की सदैव उपासना करो |
वह परमात्मा पहले भी था और अब भी है और आगे भी रहेगा। वह एक ही है।
 
नचिकेता उसे पाने के लिए किसी भी बिचोलिया कि आवश्यकता नहीं। अगर है तो सिर्फ उसे जानने की आवश्यकता है। उसे जानकर ही पाया जा सकता है। अब इन इस्लाम मजहब वालों ने क्या किया है देखें, कि सिर्फ उस अल्लाह के साथ हज़रात मुहम्मद को मिलाया ही नहीं, अपितु दिनभर के पांच बार अज़ान पुकारते वक्त भी उनका नाम लिया जा रहा है। जो कहते हैं….
अश हदू अन्ना मुहम्मदुर रसूल अल्लाह
गवाही देता हूँ मुहम्मद अल्लाह का रसूल है ।
देखें! नमाज अल्लाह केलिए और यह अज़ान नमाजिओं को बुलावा, अब इसमें मुहम्मद का रसूल होने कि गवाही का मतलब क्या है? मात्र इतना ही नहीं इस अज़ान के बाद अल्लाह से उनके लिए दुआ भी मांगते हैं |
यह है मज़हब और धर्म का भेद = महेन्द्र पाल आर्य 9/8/22

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