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मानव होकर भी परमात्मा को नहीं जाना |

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मानव हो कर भी परमात्मा को नही जाना ?

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद, और साईं भक्तों का विवाद |

शंकराचार्य –और साईं को लेकर चला विवाद में सत्य क्या है | जो दोनों तरफ से एक दुसरे को गलत बताने में,लगे हैं | शंकराचार्य जी का कहना है –की हमारे सनातन धर्म में, साईं को देवता नही माना गया अत:हिन्दू उन्हें भगवान के रुपमे न पूजें |

 

इधर साईं भक्तों का कहना है की उनमे हमारी आस्था है हम उन्हें भगवान मानते है तो किसी को क्या आपत्ति है ? हमारी आस्था है बिश्वास है, हम उन्हें भगवान मानते है आदि ?

 

अब प्रश्न है की हमारा नाम मानव किसलिए पड़ा ? उतकृष्ट प्राणी मानव को ही बताया गया,वह किसलिए ? समाधान है की मानव विवेकशील है –ज्ञानवान है –कर्मशील है- कहाँ आस्था रखनी है कहाँ नही, इसको जानने और समझने की ताकत रखने वाले का नाम मानव हैं |

इसका मतलब यह नही की आप आंख में पट्टी डालकर आस्था रखने लगे ? कारण धर्म –और अधर्म –पर विचार मानव को छोड़ अन्य किसी प्राणी को यह मजाल नही की वह भी इस धर्म –और अधर्म को जान सके ?

 

अब यह बात तो हो गयी की धर्म मानव के लिए ही है, तो उसे जानने की जिम्मेदारी किसकी होगी ? यह धर्म जुड़ा है परमात्मा के साथ, धर्म में आस्था कभी नही चल सकती ? उसका कारण यह है की धर्म के नियम बने होते हैं | अगर उसके विरुद्ध आप की आस्था हो तो क्या उसे आप धर्म कह सकते हैं, हरगिज नही ?

 

जैसा किसी कि अस्था है अपने बहन से शादी करने की, तो क्या आप अथवा आपके समाज उसे अनुमति देगी, हरगिज नही ? तो यहाँ आपकी आस्था का क्या होगा स्वीकार या अस्वीकार ?

 

आप खुद ही विचारवाण हो कर भी अब बहन से शादी करना आस्था का विषय मानेंगे, अथवा धर्म का विषय मानेंगे ? इसे सनातनी अथवा- अ सनातनी को अलग करके मानेंगे ? हिन्दू –और मुसलमनोंमे मानेंगे –या हिन्दू और जैनियों को अलग करके मानेंगे ?

 

मतलब यह निकला की सबने बहन को बहन ही मानेंगे पत्नी नही ? अब वह हिन्दू हो –मुस्लिम हों- सिख हो –जैनीहो.बौधिस्ट, यह सबके लिए बराबर है | जब यह धर्म का विषय होने से आस्था को अलग करना पड़ गया, तो पूजना –या पूजा करना धर्म का विषय है उसको अस्थाके साथ किसलिए जोड़ रहे हैं ?

 

कि हमारी आस्था है साईं में, तो हम साईं को भगवान मानेंगे ? यह बात अपने आप में गलत होगया | यानि साईं कि पूजा नहीं हो सकती कारण धर्म में मना है, धर्म में पूजा को देखना होगा की धर्म में पूजा के लिया क्या आदेश है ? धर्म पर ही मै ज्यदा लिखा हूँ –और मजहब –धर्म है या नही इसपर मेरा बहुत लेख है |

 

अब देखें की धर्म आस्था का विषय नही आदेश का विषय है –और वह आदेश जगत पालक, परमात्मा का बताया हुवा है | अगर उसके अनुसार पूजा नही करेंगे तो आप की पूजा होगी ही नही | अब यहाँ जानना जरूरी होगया की पूजा को करने से पहले हमे यह जानना होगा की पूजा क्या है ?

कैसी पूजा करनी चाहिए – किसकी पूजा करनी चाहिए ? पूजा करने से पहले अगर हम नहीं जानेंगे तो हमारी पूजा हो सकती है क्या ? अब यहाँ ज़िम्मेदारी आ गयी उसी मानवता की- कि जो मानव को पूजा करने का अधिकार है |

जब आप को पूजा करने का अधिकार मानव होने के कारण है ? तो क्या यह जानना भी जरुरी नही होगया की किसकी पूजा हमें करनी चाहिए ?

यह पूजा करने का उपदेश और अधिकार ही परमात्मा का दिया हुवा है, और वह भी किसी जाती या वर्ग विशेष को नही अपितु मनुष्य मात्र को दिया हुवा है | तो क्या उसका दिया उपदेश मनुष्य को अलग अलग दिया है ?

 

अगर उसका उपदेश अलग अलग हो तो उसपर दोष लगेगा,दोष लगने से वह परमात्मा नही हो सकते ? इस लिए उसने पूजा का उपदेश मानवमात्र को एक ही तरीका दिया या बताया है |

 

पूजा शब्द का अर्थ है सेवा,अब परमात्मा वह है, जिसे किसी वस्तुकाअभाव नही-तो उसकी सेवा किस वस्तु से करें भला ?

तो यहाँ पूजा का अर्थ जो सेवा बताया है उसकी सेवा क्या है ? ऋषि दयानन्द जी ने बड़ा ही सुन्दर अर्थ दिया है, की ईश्वराज्ञा पालन करना ही ईश्वर की पूजा है | इसको जानने के लिए वेद को जानना जरुरी है, वेदानुसार चलना, वेद मे आदेश व निषेध दो प्रकार का उपदेश है क्या करना, क्या नही करना, जब उसी बेद में हमें उपदेश मिलगया, की परमात्मा को छोड़ किसी और की पूजा नही करनी चाहिए | तो यह साईं हो या बे साईं यह सब कहाँ से आ गये ? यहाँ बात तो अपने आप ही कट गयी |

 

वेद में अनेक मन्त्र, जो परमात्मा एक है उसे छोड़ औरों की पूजा नही करनी चाहिए, जब यह उपदेश सृष्टि के आदि काल में ही मानव मात्र को बतादिया गया, उसके बाद भी किसी औरों की पूजा करना यह ईश्वरआज्ञा का पालन है या फिर उलंघन है ? एक शब्द यहाँ और जोड़ना चाहता हूँ की मात्र ईश्वरादेश का उलंघन ही नही बल्कि वह मानवता विरोधी भी है |

कि जिसे हमने पिता, माता, बन्धु, सखा कहा उसका आदेश पालन करना ही मानव मात्र का दायित्व था उस पालन हारा परमात्मा को छोड़ अगर कोई साईं को पूजे. हनुमान, और अन्य कोई मिटटी अथवा पत्थर की बनी जो इन्सान ही बनारहा है उसे पूजने लगे तो बताएं की हमने इंसानियत पर अमल किया, या उसके विरोध,में ही कार्य करने लगे ?

और इधर दम भर रहे हैं मानव होने का, सबसे ज्यादा अकलमन्द बनने का,विवेकवाण बनने का, विचारवाण  बनने का, क्या यह नाटक नही हो रहा है ?

वेद में आनेक प्रमाण है परमात्मा को छोड़ किसी और की पूजा नही करनी चाहिए | जो परमात्मा को छोड़ किसी और की पूजा करता है वह पाप करता है,मानवता पर कुठाराघात करता हैं |

 

तो बन्धुओं जब हम मानव कहलाते है तो हमारा सकल काम मानवता के आधार पर धर्म युक्त होना चाहिए, न की धर्म विरुद्ध काम मानव हो कर भी करेगे  ?

अगर मानव होकर मानवता विरुद्ध काम हमसे होगा तो हम सब मानव कहलाने के अधिकारी नहीं हो सकते | आज देखें इराक की तरफ, कौन कहेगा की मानवता की रक्षा के लिए वह काम कर रहे हैं ? और लोग इसीको इसलाम कहरहे और इस्लाम का अर्थ शान्ति बता रहे हैं, अराजकता ही अगर शान्ति है तो मानवता किसे बोलेंगा ?

अब मै इन्ही साईं भक्तों से पूछना चाहता हूँ की इस्लाम वाले इसे अपनी आस्था कह रहे हैं ? तो क्या मानव समाजमे इसकी मान्यता होगी ? तो उन इस्लाम वालों की आस्था है गैर इस्लामियों को, अथवा शिया जमात वालों को खत्म करना, तो क्या यही साईं, के आस्थावाण भक्त गण इन सुन्नी जमात वालों की इस आस्था को स्वीकार करेंगे ? फिर आप की आस्था भी यहाँ काम कहाँ आ रही है ? यही कारण है की धर्म में आस्था के लिए कोई जगह ही नही है |

इस लिए मै आप साईं भक्तों से –और पूज्य स्वामी स्वरूपानन्द जी से भी प्रार्थना करूंगा की धर्म के बारे में सही जानकारी हो तो मानव समाज को सही जान कारी दें, वरना यह गलत जानकारी दे कर मानव समाज को परमात्मा से दूर किस लिए कर रहे हैं ?

जब की वेद का आदेश ही मानव, परमात्मा का ही उपासना करें, फिर साईं से हटा कर आप भी परमात्मा से मानव समाज को जोड़ने का प्रयास कहाँ किया ? आप ने भी तो मूर्ति से जुड़ने की बात कर रहे हैं ? क्या यह मूर्ति ही परमात्मा है,अथवा मूर्ति में परमात्मा है ?

अगर मूर्ति में परमात्मा है तो उस परमात्मा से आप मानव समाज को जिस लिए नही जोड़ रहे | मूर्ति में जो परमात्मा है वह कौन है क्या उसे भी जानने का प्रयास मानव समाज को करना चाहिए ?

महेन्द्रपाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता =दिल्ली 12 =12 = 20 यह लेख मैं उसी विवाद के समय ही लिखा था |

 

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