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लोग कहते हैं इस्लाम में भाई चारा है |

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लोग कहते हैं इस्लाम में भाई चारा है ||
क्या यह सच बात है की इस्लाम में भाई चारा है ? अथवा इस्लाम ने भाई को चारा बनाया है ? हमें जरा इसपर विचार करना चाहिए क्यों की हम मानव होने के नाते विचार तो करना हमारा अधिकार भी है |
 
इस्लाम के मुताबिक जब दुनिया बनी अल्लाह ने एक इंसान बनाया जिसका नाम आदम रखा | कैसा बनाया उस पर सवाल न करें मात्र इस्लाम को सुनते जाना |
 
उस आदम के बनाने के बाद अल्लाह ने देखा उसका मन नहीं लग रहा है, तो उसी आदम के पसली की हड्डी निकालकर एक औरत बना दिया और आदम से पूछा की इसे पहचानते हो ? आदम ने कहा हाँ यह मेरे शारीर से बनी है |
 
इसमें भी आप लोग सवाल न करें की बिना हॉस्पिटल बिना सर्जन बिन दवा मलहम पट्टी के यह सभी काम कैसे हुआ ? इन सब का जवाब तो अल्लाह के पास भी नहीं है क्यों की अल्लाह वही है जो चाहे सो करे कोई कारण ही नहीं है अल्लाह के नजदीक |
इसी आदम को कोई एक फल खाने को मना किया अल्लाह ने खुद, | पर अल्लाह का विरोधी उसी फल को खिला दिया आदम पति पत्नी को | यह भी कोई न पूछे की अल्लाह कहाँ था उस समय | जब अल्लाह सब कुछ जानने वाला है तो फल खिलाते समय अल्लाह क्यों नहीं जान पाए, यह भी मत पूछना कोई |
 
मैं भाई और चारा बता रहा हूँ उस फल के खाने से अल्लाह ने आदम पति पत्नी को जन्नत से निकाल दिया इस धरती पर | यहाँ आने पर उनके संतान बने एक बेटा और एक बेटी जोड़ा जोड़ा संतान हुए |
 
आदम पुत्र दोनों भाई ने एक बेटी को अपनी सगी बहन को शादी करना चाहां तो दोनों भाई में इसी शादी को लेकर विबाद हुआ, और एक भाई ने दुसरे भाई को मार दिया |
 
अर्थात भाई को चारा बनाया गया, एक बहन से शादी करने के लिए, जब इस इस्लाम का इतिहास बता रहा है की भाई ही चारा है | फिर भाईचारा क्या है और कौन सा है ? क्या इस्लाम इसे झुठला सकता है ? की इन्हों ने भाई को चारा न बनाया हो ?
इस्लाम के प्रचारक अपने सगे सम्बन्धियों को भी मौत के घाट उतारा और अल्लाह ने खुद इन्हीं के हाथ दूसरों को मरवाया |
 
आगे चालकर हसन हुसैन जो नवासे थे नबी के उन्हें मारा उनके पिता को भी मारा यह इतिहास भरा है इस्लाम का | फिर इन्हों ने भाई किसे माना सबको प्रथम से ही चारा बनाया है इनका इतिहास पढ़ कर, इसके बाद भी कोई यह कहे की इस्लाम भाई चारा सिखाता है इससे बडा झूठ और क्या होना सम्भव है |
 
लोग यथार्थता को जानना नहीं चाहते और न हक़ ही प्रचार करते हैं बिन जाने बिन समझे ही |
 
अभी देखें जो हिन्दूअजमेर में ख्वाजा के माजर में जाते हैं अपना धन भी लगाते हैं क्या उन हिन्दुओं का एहसान यह इस्लाम वाले मानते हैं ? अगर मानते तो दरगाह के खादिम सर तनसे जुदा यह क्यों कहते ?
 
हमारे गुरुओं ने पहले ही देख और परख कर कहा था की इन्हें रत्ती भर भी विश्वास न करना | गुरु गोविन्द सिंह जी ने जान कर और समझ कर ही कहां इस बात को |
लेकिन गुरु के संतानों को आज भी यह बातें समझ नहीं आई, कौन है इन हिदुओं को बचाने वाला ? क्या यह हिन्दू अपने गुरुओं की बातों को माना है ? अथवा उनसे कुछ सीखना चाहा ? जो देख कर सुनकर भी समझना नहीं चाहते |
महेन्द्र पाल आर्य 8/7/22

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