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लोग स्वामी विवेकानंद को जानते हैं, पर दयानन्द को नहीं ?

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स्वामी विवेकानन्द को जानते हैं, पर दयानन्द को नहीं क्यों ?

दयानन्द ने भारत में सर्वाधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा हिंदी के माध्यम से समझाने का प्रयास किया और देवनागरी मे लिपि बद्ध किया | दयानन्द इस देश के सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने संतों और विचारकों द्वारा अभिव्यक्ति के लिए परम्परागत भाषा संस्कृत या निज की मात्री भाषा.अथवा तबतक प्रचलित हो चुकी अंग्रेजी के बजाय जन जन कि भाषा हिंदी को माध्यम बनाया |

दयानन्द सरस्वती ने जिस समय पाखंड खंडनी पताका लेकर अन्धविश्वास के विरुद्ध अभियान चलाया था उस समय देश के बड़े हिस्से में पिंडारियो की लूटपाट, हत्या का उत्तरार्ध चल रहा था | यह पिंडारी जो डकैत ही थे तथा उनमे अधिकतर इस्लाम मतावलम्बी थे, अपने को काली का भक्त घोषित किये हुए थे | वह जिन्हें लुटते थे उनका सिर काट लेते थे, काली को चढाने के लिये | अंग्रेजों का प्रशासनिक शिकंजा जकड़ जाने और राजा राममोहन राय जैसे लोगों के कतिपय सीमित सुधारवादी प्रयास के बावजूद सारा लम्बी अवधि की दासता से जन्मी कुरीतियों से पटा पड़ा था | छुआछूत उसका एक स्वरूप था| बाल विवाह बालिकाओ को शिक्षा न देना, कन्या के जन्म और को अशुभ मानना, विधवा का सिर मुड़ा देना आदि  |

 

समाज में इस्लामी मतावलम्बी शासकों की कुत्सित दृष्टि के कारण यद्यपि शुरू हुवा या तथापि तब तक दृढ़ हो चला था | अपनी भाषा, बेश भूषा के प्रति हीनता के भाव के साथ साथ दासत्व की प्रबृत्ति का बोलबाला हो चला था.ऐसे समय में दयानन्द ने जो प्रयास किया वह सर्वागीण था | उन्हों ने समाज को अन्ध विश्वास के गर्त से निकालने के लिए जहाँ कुरीतिओं पर करारी चोट की वहीं उन्होंने उसे आत्म गौरव के साथ खड़ा होने का बोध कराया |

उन्हों ने अतीत के स्वर्णिम दिनों का साक्षात कार कराया | उन्होंने ही सबसे पहले घोषित किया की वेद दुनिया का सबसे श्रेष्ठ ग्रन्थ है | उनहों ने बताया की दुनिया में जानने योग्य ऐसा कुछभी नहीं है जो वेदमें न हो | इसके साथ ही दयानन्द ने पुरोहिताई ढोंग को बेनकाब करना भी शुरू किया |

 

स्थान स्थान पर पुरोहिताई व्यवस्था की जकडन को सनातन व्यवस्था बताने वाले को उन्होंने शास्त्रार्थ के माध्यम से पराजित करने का दिग्विजयी अभियान चलाया जिस काशी में जगत गुरु आदि शंकराचार्य को भी कतिपय प्रश्नों के उत्तर देने के लिए अनुभूति हेतु वैदिक मान्यता को प्रवेश करना पड़ा | तथा गौतम बुद्ध को सारनाथ से ही लौट जाना पड़ा उस काशी में विद्वानों को शास्त्रार्थ से दयानन्द ने न केवल परास्त किया अपितु अपनी सम्यक सोच का स्थाई प्रभाव भी छोड़ा |

 

किसी भी समाज के पतन का मुख्य कारण होता है उसकी धीरे धीरे ढोंग में बढ़ती आस्था | ढोंग के प्रभाव से समाज तत्व के प्रति उदासीन होता जाता है और स्थूलता के प्रति अंतर भय से ग्रस्त होने के कारण श्रद्धावान इस भावना को हम श्रद्धा भी नहीं कह सकते क्योंकि श्रद्धा ऐसी भावना है जिसमे किसी प्रकार के स्वार्थ या भय की गुंजाइश नहीं होती |

वह तो आराध्य के गुणों से मोहित होकर पूर्ण समपर्ण की भावना का नाम है| पराधीनता की कई शताब्दियों के कारण शासकों से निरंतर बने रहने वाले भय से सुरक्षा की भावना से जिन लोगो के शरणागत होने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया उनमे वह लोग भी शामिल थे जिन्होंने अपने शासन के दौरान अत्याचार किया | कब्रों और मजारों की पूजा इसी प्रकार की शरणागत भावना का उदहारण है |

 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के करीब बहराइच में सैयद सालार के मेले में अभी भी 90 प्रतिशत हिन्दू भाग लेते है | सैयद सालार महमूद गजनवी के साथ भारत आया था | आयु कुल 22 या 23 वर्ष थी | उसने श्रावस्ती के राजा सुहेल देव जी जाती के पासी थे | उनकी पुत्री का डोला माँगा और उसे प्राप्त करने के लिऐ चढाई की, और मारा गया | राजा सुहेल देव की स्मृति में तो कुछ नहीं हुवा,लेकिन सैयद सालार को गाजी मान लिया गया, तथा गाजि मियां की मजार और उससे जुड़ी अपार संपत्ति आज है |

 

इसमें 90 प्रतिशत योगदान हिन्दुओं की उन जातियों का है जो सुहेलदेव की बिरादरी के ही हैं | जहाँ एक ओर मजारों और कब्रों.की पूजा में सुरक्षा की भावना ने समाज को प्रभावित किया था वहीँ परम्परागत भारतीय कर्मकांड को पुरोहिताई ने पूरी तरह से बिकृत कर दिया था |

 

दयानन्द जो की ईश्वर की सर्वश्रेष्टता के हामी कार थे उन्हों ने उसे न केवल सर्वशक्तिमान बल्कि सर्वब्यापक सर्वअंतर्यामी भी बताया | उन्हों ने पुरोहिताई ढोंग पर करारी चोट करते हुए सभी को सभी प्रकार की शिक्षा का अधिकारी जनेऊ आदि प्रतीक चिन्हो को धारण करने का पात्र घोषित करते हुए बाल विवाह का विरोध और विधवा विवाह का अभियान चलाया |

 

समाज को ढोंग से उबारने के लिए उन्हों ने उत्तर और पश्चिम भारत में व्यापक अभियान चलाया | वे पूर्व और दक्षिण नहीं जा सके थे, फलतः अस्पृश्याता आदि से पूर्व और दक्षिण भारत आज भी प्रभावित है तथा पुरोहिताई की जकड़न से उसे आज़ादी बहुत वर्ष बाद भी मुक्ति नहीं मिल सकी है | स्वदेशी दयानान्द के अभियान का मूल आधार था, जिसलिए उन्हों ने कहा था स्वदेशी राजा यदि शत्रुवत आचरण करता है तो भी,वह पुत्र वत् आचरण करने वाले विदेशी राजा से श्रेष्ठ है |

 

इतिहास के शोध कर्ताओंने यह भी लिखा है की 1857 के स्वाधीनता के लिए संघर्ष की प्रेरणा देने वाले जिन सन्यासी का उल्लेख आता है वह स्वामी दयानन्द ही थे | इस तथ्य की ओर अधिक शोध की आवश्यकता है, लेकिन जो बात बिना किसी शोध की आवयश्कता ने उन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिख दी है वह इस बात का पर्याप्त सबूत है की दयानन्द के अभियान का उद्देश्य क्या था ?

 

उन्हों ने प्रत्येक भारतीओं के लिए आर्य शब्द जिसका अर्थ श्रेष्ठ है एबं सुसंस्कृत का प्रयोग किया था | दयानन्द ने इस शताब्दी के प्रारंभ होने के पूर्व उन्हें आर्य की संज्ञा प्रदान किया था | उनका बिश्वास वर्ण व्यबस्था एबं वर्णाश्रम में था लेकिन किसी परिवार में जन्म लेने के कारण ऊँच नीच की भावना को वे इस सनातन व्यवस्था के सर्वथा विपरीत मानते थे |

उनका मानना था और समाज को वैसा ही मानने के लिए अपने आग्रह की व्यापकता के लिए ही उन्हों ने आर्य समाज नामक संगठन को खड़ा किया था, जिसकी कालांतर में दो धाराएँ शिक्षा के क्षेत्र में हो गयी |

एक गुरुकुल पद्धति दूसरी डी ० ए ० वी ० पद्धति.आज आर्य समाज का संगठन दयानन्द के उद्देश्य से भटक कर संपत्ति की हवश का शिकार हो कर उन लोगों के हाथों खिलौना बना हुवा है,जिन को वैदिक सिद्धान्त से कुछ भी लेना देना नहीं है,जभी तो आज सर्वोदेशिक सभा में मुसलमानों को बुलवा कर आफ्तार पार्टी दी जा रही थी  | उत्सव के नाम पर विदेश भ्रमण अथवा पर्यटन का ब्यापार होने लगा है, जिस वैदिक विचारों से दुनिया के लोग दयानन्द और आर्य समाज को जान पाये थे,आज उसी आर्य समाज को मात्र बारात घर के नामसे लोग जान रहे हैं |

भारत की जो स्थिति 19 वीं शताब्दी में थी उसमे और 20 वीं शताब्दी की अंतमें केवल एक अंतर यह है की देशका प्रशासन स्वदेशिओं के हाथों में है | लेकिन ऐसे स्वदेशिओं के हाथ में की जिनकी स्वदेशी भावना सुप्त हो चुकी है,जो स्वदेशी भाषा बोलने और स्वदेशी पहनावा पहनने में भी हीनता अनुभव करते हैं |

 

आजादी के बाद भी शासकों की भाषा अंग्रेजी ही है, जिन्हें भारतीय इतिहास की जानकारी नहीं जो भारत ऋषि परम्परा.और धार्मिक देश है, आज उसी भारत का प्रधान मंत्री बनाना चाहते थे उसी को जो भारत का भ नहीं जानते, धर्म का ध नहीं.जानते |

यह तो परमात्मा की अनुकम्पा है की श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी को परमात्मा ने खड़ा कर दिया-तो आज वह लोग विरोधी पक्षमे बैठने के काबिल भी न रहे | दयानन्द के प्रादुर्भाव के समय ढोंग चरम सीमा पर था | ढोंग अर्थात जो हम दूसरों से करने की अपेक्षा करते हैं. परामर्श देते हैं वह स्वयं नहीं करते |

 

उन दिनो ठगों का बोल बाला था स्वयं के अनुभूति समाप्त हो गई थी | कुछ पाने के लिए अंग्रेज बहादुर के दरबार में अर्जी पेश करने की कमी चल पड़ी थी | उस समय पाखण्डी काली के नाम से हमें लुटते थे,अब उन पिंडारीयों ने सेकुलारिज्म का मुखौटा लगा लिया है | सेकयूलारिज्म के नाम पर पिंडारीयों से भी भयावह लुट चल रही है | हमारी जो स्थिति 19 वीं शताब्दी के अंतिम वर्षीं में देश मे कई सौ देशी राजा भी थे.उनकी अपनी हुकूमत थी |

आज भी ठीक उसी तरह के राज्यों और केंद्र में कई दलों की हुकूमत हावी है, जो ईश कृपा से अब ख़त्म हो गई है | जैसे उस समय की प्राथमिकता सत्ता में बने रहने की थी वैसे ही अब भी है | आज अगर अभाव है तो किसी दयानन्द सरीखे पाखंड खंडनी पताका फहराते हुए दिग्विजयी की |

 

किसी नरेश की तरह प्रेमिका के जाल में फंस कर रसोईये ने दयानन्द,को विष देने की साजिश को जान ने के बावजूद भी राजा किंकर्तव्यविमूढ़ था आज भी कुछ स्थिति वैसी ही बनी हुई है, जैसा राजा नन्ही जान के चंगुल में फंसे थे,आज भी कुछ नेता गण मुन्नी जान के चंगुल में फंसे पड़े हैं |

 

अभी पिछले दिनों दिग्गी जी को दिखाया जा रहा था, और राय बरेली सर्केट हॉउस के सामूहिक दुष्कर्म का भी खुलासा नही हो सका है | हमारे नेताओं को न जाने कितने मुन्नी वाई घेरे है,अब तो आधुनिक मुन्नीवाई के अनेक रूप हैं | भारत का अस्तित्व इस समय दांव पर लगा हुवा है,और दिवाली के दिन भारतीय लोग दांव पर दांव लगाते हैं जुवा खेलना पाप है यह जानकर भी लोग इसी जुवा को शगुन के लिए जुवा खेलते हैं | जब की कोई जाने और न जाने पर भारत वासिओं को खूब मालूम है की युधिष्टिर की जुवा खेलने का परिणाम क्या हुवा आपस मे मार काट महाभारत जैसा कांड,और पत्नी से भी हाथ धोना पड़ गया था |

 

आज तो न मालूम लोग कितना ही रूपयों में आग लगादेते हैं दीपावली के दिन, और यह सारा काम आज़ के पढ़े लिखे लोग ही करते हैं, समाज में जो लोग अपने को पढ़े लिखे बताते है.उन्ही का यह काम है प्रदुशन को बढ़ावा देना जो खुद इस काम को करेंगे और अपने बच्चो से भी करवाएंगे | जिस प्रदुशन से दूर रहने को अथवा जिससे प्रदुशन को दूर करने के लिए यज्ञ की वैदिक व्यवस्था दी ऋषी ने की जिस प्रकार धरती के वातावरण को दूषित करते हो ठीक उसी प्रकार सबका दायित्व बनता है की वातावरण को शोधित करो यज्ञ के माध्यम से | यह हमारा धर्म का सब से श्रेष्ठ कार्य है हमारे महा पुरुषों ने इस काम को किया जो हमें विरासत में मिला है | जिसमे देवताओं की पूजा है,संगती करण,और दान भी है इसी यज्ञ को करने का अधिकार लोगों ने छीन लिया था, यह अधिकार हमें ऋषि दयानन्द ने ही प्राप्त कराया है,हब सब ऋषि के ऋणी हैं | हमारी संस्कृति में न तो आतिश बाजी है और न ही कहीं जुवा खेलने की बातें है यह महा पाप है,हमें न जुवा खेलना है और न ही पटाखा चलाना है |

अगर दांव लगानाही है तो जुवा का न लगाव इस राष्ट्र को अराजक तत्वों के हाथ से बचाने का दांव लगाओ, दयानन्द ने पाखंड खंडन कर अपनी प्राणों की आहुति दी थी,उस आह्वान के अनुरूप अपनी समाज और राष्ट्र को खड़ा करने की दांव लगाव |

दयानन्द ने श्याम जी कृष्ण वर्मा,महादेव गोविंद राणाडे,दादा भाई नौरोजी,प० बाल गंगाघर तिलक,वीर सावरकर,सायाजी राय गायक वाड, मदनलाल धिंडा, लाला हरदयाल, आदि लोगों को दयानन्द ने ही तैयार किया था | आज के दिन ऋषि को याद करना है उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करना है तो, अपने को दांव पर लगाते हुए यह पाखंड आच्छादित भारत को उन पाखण्डीयों से देशको मुक्ति दिलाने का दाँव लगाना चाहिए |

थोडा बड़ा होगया लिखते लिखते पढना = महेंद्र पाल आर्य = 20 /12 /20

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