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हमें किस बात की आज़ादी मिली ?

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हमें किस बात की आजादी ?

पिछले 1947 से तुम प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को हमारी इस पृथ्वी पर निरन्तर अपने हिसाब से आते रहते हो, पर हम तो तुम्हें अपनी भावनाओं से जोड़ कर ही देख पाते हैं।

आज से 74 वर्ष पहले जब तुम पहली बार आये थे, तो भारत के लोगों के मन में कितनी उमंग थी। पराधीनता के पश्चात वह स्वाधीनता का पहला ही दिन था । विदेशियों की दासत्व में रह कर हम भारतियों ने कितने कष्ट भोगे थे और अपनी पराधीनता की बेड़ियों को काटने के लिए हमने कितना संघर्ष किया था शायद तुम को याद भी होगा । हांलाकि तुम्हारे आने के पश्चात हम जो नई पीढ़ी देश में आये हैं। शायद हमें उस संघर्षमय इतिहास का आभास भी नहीं।

बल्कि बहुतों को तो उस युग की कथायें किसी स्वप्न लोक की कथायें मालूम होती होगी। तुम्हारे आगमन की प्रतिक्षा में कितनी राते बेचैनी से लोगों ने काटी, और अन्तिम समय तक सन्देह बना रहा उन लोगों कि दिल में, कि ऐन वक्त कोई अडंगा न खडा हो जाये और अचानक तुम न आ पाओ ।

पर नहीं आखिर तुम आ ही गये, और पूरी शान के साथ आये, यहाँ तक कि धूम, धड़ाके के साथ आए, हालांकि देश के विभाजन की टीस हरेक के दिल में चुभी होगी। उस समय लम्बे काफिलों पर काफिले पाकिस्तान से निकल कर भारत माँ की गोद में आने को छट-फटा रहे थे।

माँ का आँचल पाकिस्तान से आने वालों के खून से तर था, सब देश वासिओं की आँखें उनके दर्द से गीली थीं, कैसा विचित्र दृश्य रहा होगा, पांण्डिचेरी में बैठ कर ऋषि अरविन्द आँसू बहाते हुये कह रहे थे “ ऐ माँ आज मैं बहुत खुश हूँ – अनुशीलनी पार्टी को छोड़ कर मुझे छदम् वेश लेना पड़ा था दुश्मनों के हाथ से तुझे छुड़ाने का, जो संकल्प लिया था आज वह संकल्प पूरा हुआ। पर ऐ माँ हमारे लोगों ने तुझे ही काट कर टुकड़ा बना डाला। और आज वही सिरदर्द बना। अगर तेरे साथ यह खिलवाड़ न करते तथा तुझे टुकड़ा न बनाते न यह पाकिस्तान बनती और न यह कारगिल में भारत माँ के सपूतों को शहीद होना पड़ता और न सीयाचीन को कारगिल के साथ जोड़ने का सुझाव अमरीका को ही देना पड़ता।

अगर भारत माँ को टुकड़ा न करते तो भारत माँ के सपूत जो नियन्त्रण रेखा के निरीक्षण, उड़ान से करते समय विमान के बिगड़ जाने पर पैराशुट से प्राण रक्षार्थ शरण लेने को नीचे उतरे। दुर्भाग्य से वह भू-भाग का नाम ही पाकिस्तान हो चुकने हेतू पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा प्राण गवाना पड़ा। उस वीर को क्या पता था, कि मेरा विमान बिगड़ने वाला है पाकिस्तान की सरजमीं पर, और तू वहाँ शरण भी नहीं पा सकता ? तेरे चार वर्ष के पुत्र ही तेरा मुखाग्नि करेगा? यहीं तक ही नहीं छः भारतीय सैनिकों को किस प्रकार यातना दे दे कर मारा गया। किसी को सिगरेट के आग से दागा, और किसी की आँखे निकाल ली, तथा किसी के मूलेन्द्रियों को काटा आदि।

और यह नर संहार आज भी जारी है और यह कब थमे कोई ठीक भी नहीं। सारे मुल्कों के विरोध करने पर भी पाकिस्तान मानने को तैयार ही नहीं। क्योंकि वह हिस्सा तो भारत जैसे अपवित्र स्थान से अलग हो कर ही पाक बना है। क्योंकि यह नापाक थे, और सौभाग्य से पाक के प्रधानमंत्री ईमरान खान है, परन्तु उनकी शराफत का पता तो विश्व प्रसिद्ध को गया कि कहते कुछ और करते कुछ हैं।

जिस दिन उसका नामकरण हुआ उसी दिन से ही वहाँ के रहने वाले सभी भारतियों को दुश्मन समझने लगे थे । जिसका आधार ही कुरान है क्योंकि दुश्मनों को यातना दे-दे कर मारने का विधान कुरान में ही है । जो पिछले 1985 में चाँद मल चोपरा नामक वकील ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में इन्हीं आयतों को इकट्ठा कर के प्रमाण दिया था । पर मैं आजादी लिख रहा हूँ । तो जिस दिन आजादी मिली भारत के लोगों के दोनों आँखों में आँसू थे । पर एक आँख में दर्द के आँसू थे और दूसरी में खुशी के आसूँ । क्योंकि वर्षों साधना के पश्चात् तुम आये थे । और स्वतन्त्र भारत के प्रधानमन्त्री के प्रथम बार लाल किले पर अपने देश का झंडा फहराया था कितना जन समुदाय उमड़ पड़ा था, उस अनोखे दृश्य को देखने के लिये । तुम्हें याद है न ? मैं तुम्हीं से पुछता हूँ 15 अगस्त, कि कितने सालों से लगातार तुम आते हो, या आ रहे हो, पर तुम्हारी आगवानी में देशवासियों के पलक अब वैसे क्यों नहीं बिछते ? जैसे पहले बिछते थे ? जिन्होंने पहले स्वतन्त्रता दिवस का दृश्य देखा है । वह इस परिवर्तन को देखकर चकित होते हैं। क्योंकि हमारे देश में आज भी ऐसे नामाकुल शैतान पैदा हो गये हैं । जो कहते हैं आजादी से पहले ही अंग्रेजी राज्य ही अच्छा था।

मेरे विचार से ऐसे लोगों ने आजादी के सही अर्थ को समझा नहीं । शायद वह नहीं जानते कि प्रत्येक अधिकार के साथ कुछ कर्त्तव्यों की श्रृंखला भी जुड़ी होती है। उन कर्त्तव्यों का पालन लोगों ने किया ही नहीं, और उल्टा आजादी को ही कोसने लगे। जिन लोगों ने आजादी के लिए पूर्वजों द्वारा दिये गये बलिदानों की एवज में आजादी मुफ्तमें,या विरासत में मिल गई। वह इस श्रृंखला और मर्यादा को क्या जानें भला?

भारत भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी नर नारिओं को पता है दो अक्टूबर गाँधी जयन्ती है। पर गाँधी जैसे लोगों को जिन्होंने अपने पास शरण दिया, भारत भवन (इण्डिया हॉउस) में । मात्र गाँधी को ही नहीं अपितु अनेकों भारत माँ के सपूतों को तैयार किया । जैसा विपिन चन्द्र पाल, मदन लाल ढ़ींघरा, वीर सावरकर, रुस्तम जी दुखो जी कामा, साया जी राय गायक वाड़, तथा अनेकों क्रान्तिकारियों को जन्म दिया । इतिहास के पन्ने पलटने पर भी वह आर्य समाज के कार्य कर्त्ता तथा ऋषि दयानन्द के अनन्य भक्त व ऋषि के स्वप्न साकार करने वाले दयानन्द के हाथ के बनाये गये शिष्य श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा का नाम लोग जान नहीं पाये, और जो जानते भी हैं उनके नाम परन्तु कहना गुनाह समझते हैं । जिन के हाथों से एक भी मक्खी नहीं मरी, उन लोगों के नाम इतिहास में भरे पड़े हैं । भारत के बच्चे-बच्चे जानते हैं नेहरु परिवार से तीन को प्रधान मन्त्री बनाया गया शायद अब चौथे का नम्बर है । किन्तु तीनों भाईयों ने देश के खातिर अंग्रेजों को मार कर अपने प्राणों को बलि वेदी पर चढ़ाया, आज की पीढ़ी तो जानती ही नहीं । वह चाफेकर परिवार को, सच पूछिये तो आजादी अभिशाप नहीं, वरदान है । हे स्वतंन्त्रता दिवस, यह भी तो तुम अच्छी तरह जानते हो । यह सच है कि अंग्रेज चले गये और देश का शासन भारत वासियों पर आ गया। पर उनके हाथ में आया । जो शक्ल सूरत से, तो भारतवासी थे । किन्तु बोलचाल और दिमाग से मौकाले के मानस पुत्र थें । उसी का यह परिणाम हुआ कि अंग्रेज तो गये, पर अंग्रेजियत नहीं गई । इतना ही क्यों जिस साम्प्रदायिक के विष निवारण के लिये देश के नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार किया था । वहीं साम्प्रदायिक का विष पहले से कहीं ज्यादा जन-जन पर हावी हो गया है । राष्ट्र में जिस एकता की कल्पना लोगों ने की थी, वह छिन्न-भिन्न हो गई। तथा विघटन-कारी शक्तियाँ आसमान तक चढ़कर सारे देश को अपने ईशारे पर नचा रही हैं।

भारत के निर्माताओं ने देश के सविंधान में सम्प्रदाय निरपेक्षता के आर्दश को अंकित किया था। अब वही सिद्धान्त आपके गले की हड्डी बन गया है। होना तो चाहिये था कि किसी भी सम्प्रदाय के नाम पर निर्मित किसी दल को राजनीतिक मान्यता न मिलती, पर हो गया उल्टा। इससे साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। साम्प्रदायिकता को समाप्त करने से पहले साम्प्रदाय वाद को समाप्त करना होगा। क्योंकि जब तक यह सम्प्रदाय वाद है, तब  तक साम्प्रदायिकता  समाप्त हो ही नहीं सकती। आज भारत में अल्पसंख्यक के नाम से जगह-जगह सेल बनाया जा रहा है। कोई मुसलमानों से पूछे कि ब्रिटेन में या अमरीका में जहाँ तुम्हारा पर्सनल लॉ नहीं है, और वहाँ बहु विवाह वर्जित है। तो भारत में ही पर्सनल लॉ के लिये आप लोग इतना शोर गुल ही क्यों मचा रहे हैं ? इण्डोनेशिया आदि देशों में मुसलमान का खान-पान भारत के सनातनी हिन्दुओं जैसा है तथा प्रायः अरब देशों में सड़कें चौड़ी करने के लिए या इमारतें बनवाने के लिए न मालूम कितनी मस्जिदें और कितने ही कब्रिस्तानों तथा इमारतों को तोड़ा व हटाया गया। एवं सद्दाम हुसैन ने भी कहा था-ऐ भारत वासी मुसलमानों भारत में एक जीर्ण मस्जिद तोड़े जाने पर तुम इतना शोर मचा रहे हो, और न मालूम हमारी इस लड़ाई में अमरीका ने कितनी ही मस्जिदें तोड़ डाली और तुम सब भारतीय मुस्लिम निरब थे। आज भी पाकिस्तान व बंगला देश के दूरदर्शन व रेडियो द्वारा कितने बार परिवार नियोजन के लिए दिन में कई-कई बार प्रचार किया जा रहा है। किन्तु भारतीय मुसलमान इसे मानने को ही तैयार नहीं । इसी सम्प्रदाय निरपेक्षता के आधार पर अल्प संख्यक, बहुसंख्यक की उपेक्षा करके विशेषाधिकार माँगते हैं। इन्हें भारत में जितने अधिकार प्राप्त हैं, संसार के किसी भी देश में अल्पसंख्यक को प्राप्त नहीं है, भारत में इनकी माँगे कभी समाप्त नहीं होती।

इस प्रकार इस विघटन-कारी शक्तिओं ने अपने नाखून और दांतों को इतना पैना कर लिया है, कि शायद तलवार भी उस के सामने फेल हो जाय। कहीं आदम सेना या लश्करे तोएवा तथा हिजबुल मुजोहेदीन व कहीं शिवसेना या बजरंग दल आदि काम रहे हैं।

हे स्वतन्त्रता दिवस अब तुम ही बताओं कि हमें किस चीज से स्वतन्त्रता दिलायी है? बीसवीं सदी में भी लोग जाति वर्ग सम्प्रदायवाद से ऊपर नहीं उठ पाये, सती प्रथा का प्रचार आज भी जोरों पर है। शायद स्वतन्त्रता दिवस मुझे उत्तर देकर कहेगा कि यह काम मेरा नहीं है। मैंने तो तुम्हें उन विदेशी अंग्रेजों से मुक्ति दिलायी । हाँ यह बात सही है, पर आपने तो उस समय अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई । एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने पर भारत गुलाम हुआ था, अंग्रेजों का, और आज तो निमन्त्रण देकर ना जाने कितने ही इस्ट इण्डिया जैसी विदेशी कम्पनिओं तथा विशेष कर अंग्रेज व ईसाईयों को बुलाया जा रहा है। सोनिया गाँधी के माध्यम से पोप जोन पोल को बुलाया गया। मोहन दास करमचंद गाँधी ‘नमक आन्दोलन’ चलाये अंग्रेजों के विरोध में। क्योंकि भारतीय पर नमक बनाने हेतु टैक्स लगाया था अंग्रेजो ने, और आज वही मोहन दास करमचंद गाँधी के प्रान्त गुजरात में न मालुम कितने ही हजार वर्ग एकड जमीन उन अंग्रेजों को दिया | एक विदेशी महिला जो भारत के लोगों को इसाई करण करने वाली टेरेसा को भारत रत्न व सद्भावना पुरुस्कार दिया गया है । और हे स्वतन्त्रता दिवस तुम फिर भी कहोगे कि हम ने अंग्रेजों को भगाकर भारत को स्वतन्त्र किया?

मुझे आज भी सन्देह है कि तुमने हमें स्वतन्त्रता दिलाई होगी कभी? क्योंकि आज तक हमारी वेश भूषा एक नहीं, राष्ट्रीय भाषा को समस्त भारत में लागू नहीं करा पाये। दुर्भाग्य से पिछले दिनों भारत जैसे महान देश के प्रधानमन्त्री रहे देवगौड़ा जी जैसों को भी अपनी राष्ट्र भाषा ही नहीं आती। उर्दू को दूसरी राष्ट्रीय भाषा की मान्यता मिल रही है और इधर भारतीय मूलभाषा संस्कृत लुप्त हो रही है।

एवं राष्ट्र को प्रायः राजनेताओं को राष्ट्रीयता के बारे में ही पता नहीं कि राष्ट्रीयता को सभी राजनेतागण जानते तो राष्ट्र में रहने वालों नागरिकों का कानून व आचार संहिता को भी एक ही रखते या बनाते। जाति व वर्ग विशेष हेतु कानून अलग नहीं होता। फिर न कश्मीर मसला आता और न कश्मीरिया का धारा 370 को समाप्त करने की बात आती व नागालैण्ड वासियों के लिये न 371 आता और न ही नागालैण्ड में अपने ही मुल्क में अपने को प्रवासी समझते।

हे स्वतन्त्रता दिवस आज मैं तुम से एक सच्ची बात पूछता हूँ, क्या तुम बताओगे? वंकिम चन्द्र चट्टो पाध्याय ने जो राष्ट्रीय गान लिखा था प्रत्येक 15 अगस्त में आकर क्या उसे ही सुनते हो ? या रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने जो अंग्रेजो को भारत का भाग्य विधाता कहा उसे ही सुनते हो ?

शायद भारत के लोग आज भी तुम्हें धोखा दे रहे हैं। कयोंकि यह लोग तुम्हें प्रत्येक वर्ष यही सुनाते हैं। पंजाब,  सिंध, गुजरात मराठा आदि, पर तुमने आज तक भारत वासियों को यह क्यों नहीं पूछा ? कि ऐ धोखे बाजों सिंध कहाँ है तुम्हारे पास जो मुझे-सुना रहे हो ? जहाँतक मैं देख और सुन रहा हूँ आज पिछले कई वर्षों से 15 अगस्त तुम्हारे आगवानी में लोग तुम्हें यही सुनाते होंगे। तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त तू चीज बड़ी है मस्त। तुम्हें क्या सुनना पड़ा यह सब ? तो मेरे से सुनो। भारत के लोग तुम्हें धोखे से लाये, यहाँ के लोग श्याम जी कृष्ण वर्मा को धोखा दिया। वीर सावरकर को धोखा दिया एवं सुभाष चन्द्र बोस को धोखा देकर ही तुम्हें लाये थे, और आज ऐसेलोग हैं जो बागडोर को अपने हाथों लेना चाहते, जिन लोगों ने राष्ट्र के इन कर्णधारों को धोखा दिया है।

आज के वह राज नेता भारत के बागडोर को अपने हाथों लेना चाहते हैं – जिन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को जापान का गुप्तचर बताया कुत्ता जैसा कार्टून बना कर जंजीर डाल कर अखबार में घसीटता हुआ सुभाष चन्द्र बोस को दिखाया था। मात्र इतना ही नहीं -अपितु भारत वर्ष में नारा लगाते रहे पाकिस्तान बनाना होगा फिर भारत स्वाधीनता होगा। यह नारा उन लोगों का था जो भारत में जन्मे महापुरुषों का चित्र अपने कार्यालय में नहीं लगाते। अपितु राशिया व चायना में जन्में लेनीन माँवसेतुंग होचीमीन आदि के चित्र से ही कार्यालय भरें हो । ऐ स्वतन्त्रता दिवस तुम बोलो ना, यह सब सच है या नहीं?

स्वतन्त्रता दिवस हम तुम्हीं से पुछते हैं, तुमने हमें कैसी आजादी दिलाई? जिन अंग्रेजों ने भारतवासिओं को सत्ता का लालच देकर अंग्रेज द्वारा ही राजनीति पार्टी कायम किया देश को चलाते रहे क्षेत्रफल में जितना बड़ा भारत मिला था कया आज भी उतना बड़ा है?

हे स्वतन्त्रता दिवस तुम खामोश क्यों हो? आज मैं तुम्हीं से पूछना चाहता हूँ कि आखिर तुम कुछ तो बोलो, कि हमें किस बात की आजादी दिलाई है? हाँ- यह तो जरुर है- मायावती को चन्द्रशेखर जैसे क्रान्तीकारी को राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी कहने की आजादी तो जरुर मिली है। राबड़ी देवी जैसी अंगूठा टेक महिला को मुख्यमंत्री बनने की आजादी तो अवश्य मिली है ?  अनपे देस बंगाल प्रान्त के मुख्यमंत्री भारत के प्रधानमंत्री बंगाल आने पर उन्हें बाहर के हैं बोलनी की आजाद त मिली है उन्हें थप्पड़ मारेंगे कहने क आज़ादी त जरुर मिली है | फ़र्ज़ किसान नेता बताकर लाल किले में खालिस्तानी झन्डा लगाने की आज़ादी भी मिली है क्या क्या लिखूं 15 अगस्त तुम्ही बताव की आज हमें किस प्रकार की आज़ादी याद दिला रहे हो ?

महेंद्रपाल आर्य = 15/8/21=

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