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|| हर एक मजहबी अंध विश्वासी है ||

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|| हर एक मजहबी अंध विश्वासी है ||
मैं बचपन से सोचता था,कि कुरान के अतिरिक्त और कोई धर्म पुस्तक नही, और इस्लाम को छोड़ कर दूसरा कोई धर्म ही नही है | क्योंकि बचपन से यही शिक्षा मुझे बिरासत में मिली थी | परन्तु 32 वर्ष आयु के बाद,जब मैं एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश, को देखा, जिस में वैदिक मान्यता वैदिक सिद्धांत,और वैदिक ऋषि परम्परा को पढ़ कर देखा, तो मेरी ऑंखें खुली की खुली रह गई | कारण मैं अब तक यही जानता था,कि कुरान ही एक मात्र किताब है धरती पर जो आसमानी है,और अल्लाह का दिया हुवा मानव मात्र के लिए उपदेश है |अथवा यही ईश्वरीय एक मात्र ज्ञान है,जो आसमानी है, उपर से उतरा हुवा,कुरान पर सवाल करना,अथवा सन्देह संभव नही है | अब वैदिक मान्यता, ईश्वर और ईश्वरीय ज्ञान क्या है किसे ईश्वरीय ज्ञान कहा जाना चाहिए उसकी मान्यता क्या है कसौटी क्या है, इन सभी विषयों को जब भली भांति सत्यार्थ प्रकाश व ऋग्वेदादी भाष्यभूमिका ऋषि दयानन्द रचित पढने लगे, और उसके गहराई में जब डूबे तो मेरे मनमें एक के बाद एक जिज्ञासा, होती गई और उसका जवाब भी उन्ही वैदिक मान्यता से हमें मिलती चली गई आगे क्या है, और क्या है ,इस लालसा में डुबकी लगाते ही रहे |
आज 38 वर्षीं से अनेक कुरान वेत्ताओं से शैखुल हदीस {हदीसों के माहिर }और मुफ़स्सिरे कुरान {कुरान के भाष्यकार} इस्लाम जगत के अनेक आलिमों से मिले और बहुतों से पत्राचार किया, किन्तु आज तक मेरे जिज्ञासा मन को शांत नही कर सके और ना आज तक कोई सन्तोष प्रद उत्तर ही दे पाए |
 
पिछले दिनों 85 से 90 तक मैं कोलकाता में बंगाल आर्य प्रतिनिधि सभामें, सार्व देशिक सभा द्वारा नियुक्त था | अनेक समय से मैं बंगाल से बाहर दिल्ली में रहा, जब 85 में कोलकाता में रह कर वैदिक धर्म का प्रचार कार्य में लगे रहे, 42 शंकर घोष लेंन कोलकाता, 6= बंगाल सभा की बिल्डिंग में रहता था | प्रचार कार्य के लिए एक दिन मैं बड़ाबाजार आर्य समाज में जाने लगा, मुझे रास्तेमें एक पुराने सहपाठी मिले, उसने मुझे धोती पहने देख कर कोसने लगा |
कहा तू एक मौलवी का बेटा,और खुद भी अलिम हो कर यह काफिराना लिबास में तू घूम रहा है ? क्या तुझे यह मालूम नही कि {मन तश्ब्बाहा बेकौमिन} का फतवा लगेगा तेरे उपर? من تشبها بقوم } {अर्थात जो मुसलमान जिस कौम के लिबास {परिधान} में,दुनिया में रहेगाअल्लाह तायला हश्र के दिन,उसी कौमके साथ उसे उठाएंगे |
 
मैंने कहा बिलकुल ठीक बात है, पर मैं तुझसे पूछता हूँ कि यह धोती काफिराना लिबास है |और यह पैन्ट,शर्ट,कोर्ट,टाई, आदि,यह लिबास किन लोगोंका है भाई? क्या आज तक तूने अपने किसी भाई को अथवा अपने कौम के लोगों को बताया है, की भाई यह ईसाइयत वाला लिबास आप लोग किसलिए पहनते है ?
भारत में रहकर भारतीय परिधान को क्यों नही पहनते,भारत में रहकर इंग्लॅण्ड, व.लंडन वाला लिबास पहना जा सकता है, अरबियन लिबास पहना जा सकता है, पाकिस्तानी शलवार शूट पहना जा जकता है | किन्तु भारत में रहकर भारतीय परिधान पहनना काफिराना लिबास कह कर क्या तू भारत का अपमान नही कर रहा है ?
बाकि कल देखना यही मेरी पुस्तक से उठाकर दिया है, 31 /1 /21 =

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