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आर्य समाज में बढ़ रहा है निरन्तर पंडा गिरी |

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ऋषि ने कर्म कांड के लिए दो पुस्तकें लिखी , एक का नाम संस्कार विधि, दूसरा पञ्च महा यज्ञ विधि | इन ग्रंथों में त्रियम्बकम, व स्तुता मया मन्त्र यज्ञ में आहुति देने को कहीं नहीं बताया |
परन्तु यज्ञ कराने वालों की यज्ञ इसके बिना पूरा ही नहीं होती जो मान्यता ऋषि की नहीं | ठीक इसी प्रकार पारायण यज्ञ को भी इसी तरीके से बना लिया है, वेदी की चारों तरफ यज्ञमान बनाकर बिठादेते हैं एक के बजाय चारों से दक्षिणा मिलेंगे | जबकि चार असं में बैठने वालों का नाम अलग है और दायित्व भी अलग है | यही सब पाखंड चल रहा है आर्य समाज में |

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